Rakhi

बाघा बॉर्डर पर बिहार की शिवांगी सैनिक भाइयों को बांधेंगी Rakhi

कही-सुनी
 मन में बड़ी इच्छा थी- बॉर्डर पर जाकर भैया को Rakhi बांधने की

बाघा बार्डर पर तैनात बीएसफ जन विकास के लहेरियासराय स्थित घर में उत्सवी माहौल है। उनकी छोटी बहन शिवांगी बाघा बॉर्डर पर सैनिक भाइयों को Rakhi बांधने के लिए पहली बार जाएंगी। भाइयों की कलाइयों में राखी बांधने की सोच से ही वह रोमांचित हैं। विकास के पिता बिहार पुलिस में हैं। वह Rakhi खरीदने में बिटिया की मदद कर रहे हैं। शिवांगी कहती हैं, कई बार सपने तो देखे, ऐसा कभी नहीं सोचा था।

राखी बांधने की कल्पना से रोमांचित शिवांगी के ही शब्दों में मन में बड़ी इच्छा थी, बॉर्डर पर जाकर भैया को राखी बांधने की। सोचती थीं कि मेरे भाई की तरह और जन रक्षाबंधन के दिन इस प्रतीक्षा में रहते होंगे कि काश, उनकी बहन भी Rakhi बांधने आती। आंखों में खुशी के आंसू भी छलक उठते हैं। भावुक शिवांगी बताती हैं कि देखिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। कैसे कहूं कितनी खुशी हो रही है।

अभी से ही घर में तैयारियां शुरू हो गई हैं। एक दुकानदार को ताजा पेड़ा बनाने का ऑर्डर दे दिया गया है। विकास को दरभंगा के पेड़े बहुत पसंद हैं। चने का सत्तू, घर के अचार, भूना हुआ चूड़ा-बादाम और मखाना भी ले जाना है। शिवांगी कहती हैं कि भैया के साथ सीमा पर तैनात सभी भाइयों को Rakhi बांधनी है। यह जानने के लिए भैया को फोन किया था कि उनके साथ कितने जन वहां तैनात हैं? जितने जन, उतनी राखियां ले जानी है। सभी भाइयों की कलाइयों पर Rakhi बांधनी है।



प्रेरित करेगा Rakhi का कार्यक्रम

विकास के पिता सुरेन्द्र सिंह बिहार पुलिस के हवलदार हैं। वह दरभंगा के पदस्थापित हैं। पटना जिले के फतुहा के नरमा गांव के स्थायी निवासी हैं। कई वषों से लहेरियासराय पुलिस लाइन में उनका आवास है। शिवांगी बीए ऑनर्स के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं। विकास के पिता सुरेन्द्र काफी उत्साहित हैं। कहते हैं कि हमारा विभाग ऐसा है कि कभी छुट्टी ही नहीं मिलती है।

ऐसे में अपने बेटे से बॉर्डर पर जाकर मिलने का मौका दिया है। वाघा सीमा पर दोनों देशों की परेड देखने की इच्छा है। अपने बेटे को सीमा पर सैनिक के ड्रेस में देखेंगे। विकास की माता रंजू देवी भी बॉर्डर पर जाकर अपने बेटे से मिलने के लिए बेकरार हैं।



Rakhi



बहन का नाम आते ही याद आती हैं शरारतें

बार्डर पर 88 बटालियन में तैनात बिहार के कांस्टेबल विकास राखी शब्द के साथ ही सोच में डूब जाते हैं। वे कहते हैं कि पिछले 5 साल में वे Rakhi पर सिर्फ एक ही बार अपनी बहन के पास जा पाए हैं। भाई-बहन मिलकर घर में शरारतें करते थे। विकास कहते हैं कि एक बार शरारतों से तंग आकर माता-पिता ने हमें एक कमरे में बंद कर दिया। कमरे के अंदर एक तरबूज पड़ा था। हमने सफाई से उसे काटा और अंदर का हिस्सा खा गए। खोल को वैसे ही सटाकर रख दिया।

काफी देर बाद मां ने कमरे का दरवाजा खोला और हमें खाना दिया। खाने के बाद जब वह हमें तरबूज देने के लिए कमरे में पहुंची तो उसका खोल जमीन पर गिर गया। मां ने कहा कि यह दोनों भाई-बहन तो सजा को भी इंज्वाय करते हैं। यह दिन मैं कभी नहीं भूलता। तमन्ना है हर राखी पर बहन के पास जाऊं



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