यह है बिहार का ब्रांड अंबेसडर मधुश्रावणी पर्व, महिला पंडित करवाती हैं पूजा

आस्था

 संपूर्ण विश्व भर में महिला सशक्तिकरण को लेकर जोर शोर से आंदेालन किया जा रहा है। किसी भी देश की बात करें तो पता चलता है कि महिलाओं को उसका उचित अधिकार नहीं दिया गया।वे लोग आज भी ओ अधिकार नहीं प्राप्त कर सकी हैं जो उन्हें करना चाहिए था। भारत में भी कुछ ऐसा ही हाल है। लेकिन बिहार के मिथिला क्षेत्र की बात करें तो महिलाओं की स्थिति वर्तमान समय से काफी अलग हुआ करती थी। वैसे यहां भी महिला समाज हरेक क्षेत्र में अग्रणी नहीं रही है, किंतु विद्या के क्षेत्र में स्थिति काफी सराहनीय है।

रामायाणकाल से ही यहां की महिलाओं को शिक्षा का अधिकार प्राप्त था। तभी तो मिथिला पुत्री गार्गी का यहां जन्म हुआ। उन्हें राजा जनक के दरबार में स्थान प्राप्त था। वो विद्वान सभा में बैठकर ब्रह्मज्ञानी लोगों के साथ शास्त्रार्थ करती थी। क्या बिना शिक्षा के यह संभव हो सकता है। इसी तरह सुलभा, सुनयना, मैत्रेयी, भारती, लखिमा सहित कई उदाहरण इतिहास में सहज रूप से मिलता है।
इतना हीं नहीं यहां की महिलाओं को पंडित बनने का भी अधिकार प्राप्त था। जो आज भी है। मधुश्रावणी पर्व में आज भी महिलाएं पंडित बन पूजा करवाती हैं। जानकार लोगों की माने तो इस पर्व में गांव मोहल्ला की वृद्ध दादी, काकी, पीसी आदि बनती हैं। वो प्रतिदिन व्रती महिला को विधिवत पूजा संपन्न करवाती हैं। पंद्रह दिनों तक चलने वाली इस पर्व में हरेक दिन अलग अलग कथा महिला पंडित द्वारा सुनाया जाता है।
अन्तिम दिन उन्हें दक्षिणा में नई साड़ी, अन्न एवं पैसे मिलते हैं। इतना हीं नहीं गांव में उन्हें ‘पण्डितजी’ कह कर भी संबोधित किया जाता है। अभी भी कई जगह पर मधुश्रावणी पूजने वाली महिलाओं के बीच फूल लोढ़ने के समय यह कहते सुना जाता है कि ‘गे बहिना तोहर पण्डीजी के छथुन, हमर तँ अपने बड़की मैञा छथि?’अर्थात हे बिहना तुम्हारी पंडितजी कौन हैं, हमारे यहां तो बड़ी दादी हैं। यह परम्परा आज भी मिथिला क्षेत्र में सहज रूप से देखने को मिल जाता है।
credit- Roshan Kumar Maithil

 

 

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