पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार कहा जाने वाला किशनगंज ने बिहार को चाय उत्पादक राज्यों की श्रेणी में शुमार करते हुए बिहार का मान बढ़ाया है। इतना ही नहीं हजारों लोगों को टी-गार्डेन से रोजगार का अवसर भी मिल रहा है।

किशनगंज में वर्ष 1990 की दशक में चाय की खेती बड़े पैमाने पर होने लगी। इसी के मद्देनजर तत्कालीन सीएम नीतीश कुमार ने किशनगंज की टी-सिटी बनाने की घोषणा भी की। लेकिन यह घोषणा अमल में नहीं आ सका। बुद्धिजीवि बताते हैं किशनगंज को टी-सिटी का दर्जा मिल गया होता तो यहां के चाय उत्पादक किसानों की माली हालत बेहतर होती साथ ही अन्य किसानों का रुझान भी चाय की खेती की ओर बढ़ता। जिससे किशनगंज भारत के मानचित्र पर अपना अलग पहचान को नया मुकाम देता। वर्ष 1956 ई. में राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा किशनगंज अनुमंडल के करणदिघि से सोनापुर (अब बंगाल) के छह प्रखंड काटकर यदि पश्चिम बंगाल को न दे दिये जाते तो किशनगंज के माध्यम से बिहार 1956-57 में चाय उत्पादक राज्य हो जाता। कभी किशनगंज का हिस्सा रहा सोनापुर आज पश्चिम बंगाल राज्य में चाय व अनानास उत्पादन में कमाउ पूत बना है।

बिहार का चेरापूंजी कहा जाने वाला किशनगंज में चाय की खेती के लिए मिट्टी व मौसम माकूल है। किशनगंज में बिहार के अन्य जिलों की तुलना में अधिक बारिश होती है जो चाय की खेती के लिए मुफीद मानी जाती है। नतीजा है जिले के सात प्रखंडों में से ठाकुरगंज, पोठिया व किशनगंज प्रखंड में लगभग 40 हजार एकड़ में चाय की खेती हो रही है। अगर सरकारी घोषणा अमल में आ जाए तो शेष बचे प्रखंड बहादुरगंज, कोचाधामन व टेढ़ागाछ में भी चाय की खेती की शुरुआत हो सकती है। सबसे खास बात यह है कि चाय की खेती के कारण यहां के हजारों मजदूरों को चाय बगानों से रोजगार भी मिल रहा है।

किशनगंज में बनी चाय दार्जलिंग जिले की चाय से बखूबी ठक्कर ले रही है। निजी टी प्रोसेसिंग प्लांट में बनी चाय बिहार के अन्य जिले सहित दूसरे प्रदेशों में भी खूब बिक रही है। राजबाड़ी ब्रांड के नाम से बिक रही किशनगंज की चाय लोगों को खूब भा रही है। जानकार बतातें हैं कि सरकार चाय उद्यमियों के प्रति थोड़ा उदारता दिखाए तो यहां आधा दर्जन टी प्रोसेसिंग प्लाट व चाय की खेती बड़े पैमाने पर और बढ़ सकती है।

Sources:-Hindustan

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