‘भोजपुरी के शेक्सपियर’ भिखारी ठाकुर के लोकगीत को बिग बी अमिताभ बच्चन देंगे आवाज, पद्मश्री से भी सम्मानित हो चुके हैं

एक बिहारी सब पर भारी

‘बिदेशिया’ जैसी लोकप्रिय नाटक के रचयिता भिखारी ठाकुर किसी परियच के मोहताज नहीं है। भोजपुरी संस्कृति को समृद्ध करने में उनका कोई जोड़ नहीं है और इसी वजह से उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता है। उनके द्वारा रचित नाटक काफी लोकप्रिय रहे हैं। भिखारी ठाकुर के अमर नृत्य-नाटक बिदेशिया पर सन् 1963 में एक फिल्म बनी, जिसका संगीत बहुत हिट हुआ।

भिखारी ठाकुर का लिखा एक गीत ‘हंसी-हंसी पनवा खियौलस बेइमनवा, अ रे बसेला परदेस’ जिसे एसएन त्रिपाठी ने संगीतबद्द किया था और मन्ना डे गाया था। वह काफी प्रसिद्ध हुआ था। अब उनके लोकगीत को जल्द ही बिग बी यानी बॉलीवुड के महानायक अपनी आवाज देंगे। भिखारी ठाकुर के प्रसिद्ध लोकगीत ‘ए मोरे गंगाजी..’ को नए सिरे से संगीतबद्ध किया जा रहा है।


गायिका कल्पना भी इस प्रोजेक्ट से जुड़ी हैं। कल्पना ने बताया कि अभिनेता अमिताभ बच्चन गीत के कुछ हिस्सों में अपनी आवाज देंगे। उन्होंने इसकी सहमति दे दी है। जब-जब गीत में ‘ए मोरे गंगाजी..’ के बोल आएंगे, बिग बी की आवाज सुनाई देगी। बाकी पूरा गीत कल्पना की आवाज में होगा।

वीडियो बनारस में शूट किया जाएगा। ऑडियो रिकॉडिर्ंग का काम लगभग पूरा हो चुका है। इस में संगीत देने जा रहे हैं दक्षिण भारत के विख्यात संगीतकार लुई बैंक्स। लुई को फादर ऑफ इंडियन जैज भी कहा जाता है। उन्हें सबसे अधिक प्रसिद्धि मिली दूरदर्शन के 14 भाषाओं वाले गीत मिले सुर मेरा तुम्हारा.. से, जिसमें उन्होंने संगीतकार अशोक पातकी का सहयोग किया था।

राहुल सांकृत्यायन द्वारा भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का शेक्सपीयर कहे जाने के बाद से ही दोनों की तुलना होती रही है। इस गीत के वीडियों में भिखारी ठाकुर की जन्मभूमि कुतुबपुर और शेक्सपीयर की जन्मभूमि शेनफोड भी दिखेगी। दोनों जगहों की शूटिंग हो चुकी है।


प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों ने बताया कि शेक्सपीयर के घर को वहां की सरकार ने आकर्षक पर्यटक स्थल बना दिया है, जबकि भिखारी ठाकुर का घर समय के साथ और अधिक बदहाल और उपेक्षित होता चला गया। शायद इससे कला के रहनुमाओं की नींद टूटे। वीडियो में भिखारी से जुड़ी दूसरी जगहें भी दिखाई जाएंगी। अभी तक की योजना के अनुसार, पूरा गीत करीब साढ़े चार मिनट का होगा।

18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया।

भिखारी ठाकुर ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, उसके बावजूद उन्होंने कई कृतियों की रचना की। उनके द्वारा रचित नाटक बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा बेटी-बियोग, बिदेसिया की प्यारी सुंदरी, नशाखोर पति आदि आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितना पहले हुआ करते थे।


भिखारी ठाकुर के नाटकों का मजबूत पक्ष उनके स्त्री पात्र रहे। ‘बिदेसिया’ की नायिका नवविवाहित बिरहिनी उन लाखों भोजपुरियों की व्यथा उजागर करती है जिनके पति रोजी-रोटी कमाने पूरब के तरफ कलकत्ता और असम गए।

भिखारी ठाकुर अंतिम समय तक सामाजिक चेतना की अलख जगाते रहे। कोई उन्हें भरतमुनि की परंपरा का पहला नाटककार मानता हैं, तो कोई भोजपुरी का भारतेंदू हरिश्चंद्र।


महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर की उपाधि दे दी। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया। इतना सम्मान मिलने पर भी भिखारी गर्व से फूले नहीं। उन्होंने बस अपना नाटककार ज़िंदा रखा।

भोजपुरियां और पूर्वांचल आज भी भिखारी ठाकुर के नाटकों से गुलज़ार है। ये बात अलग है कि सरकारी उपेक्षा का शिकार इनके गांव तक अब भी नाव से ही जाना पड़ता है।

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