वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण का प्रभाव इस वर्ष शारदीय नवरात्र पर भी देखने को मिल रहा है। वारिसनगर स्थित माता का प्रसिद्ध मंदिर मन्नीपुर में इस वर्ष पूजा की 115 साल की परंपरा टूटेगी। बताया जाता है कि पहली बार शारदीय नवरात्र में श्रद्धालुओं को खोइंछा भरने की अनुमति नहीं होगी। केवल संकल्पकर्ता का परिवार की सरकारी पूजा बाद माता का खोइंछा भरेंगे।

वहीं किसी भी श्रद्धालुओं को माता के गर्भगृह में प्रवेश पर भी पूरी तरह से रोक होगी। सप्तमी को माता का नेत्रपट खुलने व उसके बाद प्रसाद चढ़ाने आने वाले श्रद्धालुओं से मंदिर के गेट पर ही प्रसाद लेने की व्यवस्था होगी। मंदिर के स्वयं सेवक श्रद्धालुओं का प्रसाद लेकर रखेंगे, जिसे पुजारी के माध्यम से चढ़वाकर बांटा जाएगा।

मंदिरों में दूसरे दिन हुई ब्रह्मचारिणी की पूजा

नवरात्र के दूसरे दिन रविवार को पूजा स्थलों पर माता के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की गई। इनकी पूजा सिद्धियों की प्राप्ति के लिए की गई। वहीं तीसरे दिन श्रद्धालु अपने पापों व बाधाओं की समाप्ति के लिए माता चंद्रघंटा की पूजा करेंगे।

1904 से होती है मंदिर में माता के आपरूपी स्वरूप की पूजा-अर्चना

मंदिर में माता के आपरूपी स्वरूप की पूजा 1904 से होती है। मंदिर के पुजारी कमल कांत झा ने बताया कि यहां माता के आपरूपी स्वरूप की पूजा 115 वर्षों से की जा रही है। वैष्णवी स्वरूप में माता की अराधना मिथिला पद्धति से की जाती है।

कोविड-19 गाइडलाइन का कराया जाएगा पूरी तरह से पालन : सचिव

वहीं मंदिर कमेटी के सचिव रमेश कुमार ने बताया कि पूजा के दौरान कोरोना गाइडलाइन का पालन कराया जाएगा। मंदिर के संकल्पकर्ता को छोड़ कोई श्रद्धालु खोइंछा नहीं भरेंगे। जो भी प्रसाद चढ़ाने आएंगे उसे स्वयं सेवक पुजारी से चढ़वाएगे।

Input : Danik Bhaskar

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