PATNA : देश और दुनिया में भागलपुर की पहचान यहां के सिल्क को लेकर है। इसकी नींव मुगलकाल में ही पड़ गई थी। कोलकाता बंदरगाह से भेजे जाने वाले भागलपुरी सिल्क की दुनियाभर के रईसों के बीच धाक थी।

ब्रिटिश काल में यह कारोबार और मजबूत होता गया और यहां का सिल्क रईसों की पहली पसंद बन गई। लेकिन उदारीकरण और बाजार की प्रतिस्पर्धा में पिछड़े भागलपुरी सिल्क की चमक भी समय के साथ फीकी होती गई। हालांकि, आज भी भागलपुरी सिल्क का सालाना कारोबार करीब 350 करोड़ का है। यहां के सिल्क व्यवसायी कोलकाता, दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई बेंगलुरु, सूरत, अहमदाबाद आदि शहरों के अलावा जापान, ब्रिटेन, अमेरिका और खाड़ी के देशों से सीधे कारोबार करते हैं।

सिल्क के कपड़ों के उत्पादन में चीन पहले स्थान पर बना हुआ है। चीन में इसका सालाना उत्पादन 1 लाख 70 हजार मीट्रिक टन है, जबकि दूसरे स्थान पर रहनेवाले भारत में इसका उत्पादन 28,523 मीट्रिक टन है। एक अनुमान के मुताबिक विश्व के टेक्सटाइल मार्केट में सिल्क की हिस्सेदारी 0.2 प्रतिशत से भी कम है। हालांकि, कुल सिल्क के उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक एशियाई देशों में होता है। कुल चार तरह के सिल्क तसर, मलबरी, एरी और मूंगा होते हैं। मलबरी के क्षेत्र में बंगाल, मूंगा में असम, एरी में बेंगलुरु तो तसर सिल्क में भागलपुर की बादशाहत बरकरार है।

हालांकि, तसर सिल्क का कारोबार छत्तीसगढ़ के चापा, उड़ीसा के नवाब, पटना और झारखंड के सिंहभूम में भी होता है। इससे जुड़े कारोबारी बताते हैं कि जापान में भागलपुरी सिल्क के कालीन विशेष रूप से पसंद किए जाते हैं। ईसा पूर्व से रेशम उत्पादन में बादशाहत रखने वाले चीन ने समय के साथ इसके कारोबार को बाजार की प्रतिस्पर्धा से जोड़ा। सिलिकन वैली की तरह सिल्क स्ट्रीट बनाई। एक छत के नीचे सभी तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराईं। उसकी ब्रांडिंग के लिए काम किया। यही कारण है कि चीन दूसरे स्थान पर रहने वाले भारत से करीब छह गुना आगे है।

प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भागलपुरी सिल्क भी पिछड़ गया। न तो सरकार का सहयोग मिला और न ही इसके उत्पादन के लिए उन्न्त तकनीक अपनाई गई। हैरानी यह कि बिहार में सिल्क उत्पादन में एकमात्र क्षेत्र होने के बावजूद इससे जुड़े कामगारों को कभी ट्रेनिंग देने तक की व्यवस्था नहीं कराई गई। परिणाम भयावह निकला। भागलपुर का सिल्क उद्योग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। आर्थिक संकट से जूझ रहे बुनकर पलायन करने लगे हैं। इसके बावजूद बुनकरों का हौसला कायम है। उनका कहना है कि सरकार नयी तकनीक और बाजार उपलब्ध कराए तो हम चीन को टक्कर देने में सक्षम हैं।

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