आइंस्टीन के सिद्धांतों को चैलेंज करने वाले और नासा के कंप्यूटर्स को टक्कर देने वाले जाने-माने गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का शौक सिर्फ किताबें ही थीं। जब वह अमेरिका से लौटकर भारत आए तो अपने साथ 10 बक्से भरकर किताबे लाए थे। बंगलौर में जब उनका उपचार चल रहा था तब उनकी भाभी प्रभावती ने कहा था “हिंदुस्तान में मिनिस्टर का कुत्ता बीमार पड़ जाए तो डॉक्टरों की लाइन लग जाती है। अब हमें इनके इलाज की नहीं किताबों की चिंता है। यह पागल खुद नहीं बने, समाज ने इन्हें पागल बना दिया।”

वशिष्ठ नारायण सिंह के बारे में बताया जाता है कि किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त थी। वह हाथ में पेंसिल लेकर यूं ही पूरे घर में चक्कर काटते रहते थे। कभी अखबार, कभी कॉपी, कभी दीवार, कभी घर की रेलिंग, जहां भी उनका मन करता, वहां कुछ लिखते, कुछ बुदबुदाते रहते थे। मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित वशिष्ठ नारायण सिंह पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिताते रहे।

पटना साइंस कॉलेज में बतौर छात्र वह गलत पढ़ाने पर वह अपने गणित के अध्यापक को टोक देते थे। कॉलेज के प्रिंसिपल को जब पता चला तो उनकी अलग से परीक्षा ली गई, जिसमें उन्होंने सारे अकादमिक रिकार्ड तोड़ दिए थे। पांच भाई-बहनों के परिवार में आर्थिक तंगी हमेशा डेरा जमाए रहती थी, लेकिन इससे उनकी प्रतिभा पर ग्रहण नहीं लगा।

उनके भाई अयोध्या सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया था कि “भइया (वशिष्ठ जी) बताते थे कि कई प्रोफेसर्स ने उनके शोध को अपने नाम से छपवा लिए हैं। यह बात उनको बहुत परेशान करती थी।” आर्मी से सेवानिवृत्त वशिष्ठ के भाई अयोध्या सिंह इंटरव्यू में यह भी बताया था कि “उस वक्त तत्कालीन रक्षा मंत्री के हस्तक्षेप के बाद मेरा बेंगलुरु तबादला किया गया जहां भइया का इलाज हुआ, लेकिन फिर मेरा तबादला कर दिया गया और इलाज नहीं हो सका।”

डॉ. वशिष्ठ का परिवार उनके इलाज को लेकर नाउम्मीद हो चुका था। घर में किताबों से भरे बक्से, दीवारों पर वशिष्ठ बाबू की लिखी हुई बातें, उनकी लिखी कॉपियां अब उनको डराती हैं। उन्हें डर इस बात का है कि क्या वशिष्ठ बाबू के बाद ये सब रद्दी की तरह बिक जाएगा।

Sources:-Dainik Bhasakar

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