समस्तीपुर के इंजीनियर भाईयों की कहानी पढ़ आप भी कह उठेंगे “भाई हो तो ऐसा”

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आजकल हम भाइयों को झगड़ते अक्सर देखते और सुनते है। ऐसे भाइयों के बारे में भी पढ़ते हैं जिन्होंने अपने भाई की जान लेने में भी संकोच न किया।

पर आज भी ऐसे भाई मौजूद हैं जिन्हें देख आपको राम-लक्ष्मण की याद आ जाएगी। ये हैं समस्तीपुर के परोरिया गांव में रहने वाले बसंत और कृष्ण। हैं तो ये दो अलग जिस्म लेकिन दोनो की जान एक दूसरे में बसती है। उनका उठना-बैठना, पढ़ना-लिखना, सोना-जागना, हँसना-रोना, नहाना-धोना और सभी काम पिछले 15 साल से एक साथ होते हैं।

यह को फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं, असल ज़िन्दगी की कहानी है।

किसान मदन पंडित के बड़ा पुत्र कृष्ण डेढ़ साल की उम्र में पोलियो से ग्रसित हो गया था जिससे उसके दोनों पैरों के साथ दांए हाथ ने काम करना बंद कर दिया था। जब मैदान पंडित का छोटा बेटा बसंत स्कूल जाने लायक हुआ तब दोनों का दाखिला गांव के स्कूल में करवाया गया।
नन्ही सी उम्र से ही बसंत ने अपने बड़े भाई को कंधे पर बिठाकर स्कूल ले जाना शुरू किया। कृष्ण कहता है की बसंत ने कभी उन्हें बोझ नहीं माना। बसंत अपने बड़े भाई कृष्णा का हर काम करता है। कंधे पर बिठाकर हर जगह ले जाता है चाहे काम से जाना हो या घूमने के लिए। अपने हाथों से खाना भी खिलता है।

अपने बड़े भाई के लिए अपनी भावना व्यक्त करते हुए बसंत कहता- अपने भाई के लिए कुछ भी कर सकता हूं।मुझे अपने बड़े भाई के लिए कुछ करने में बहुत ही ख़ुशी मिलती है।

इतना ही नहीं, इतनी मुश्किलों का सामना कटे हुए कृष्ण और बसंत ने एक साथ कोटा में पढ़ते हुए जेईई एडवांस की परीक्षा में सफलता हासिल कर पूरे बिहार का सर गर्व से उँचा कर दिया था। अभी दोनों ही भाई इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं।

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