कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी सोमवार, 11 नंवबर को है। इसे बैकुंठ चतुर्दशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु और शिवजी की विशेष पूजा करनी चाहिए। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी यानी चातुर्मास की शुरुआत में भगवान विष्णु सृष्टि का भार भगवान शिव को सौंप देते हैं और वे विश्राम करते हैं। इन चार महीनों में सृष्टि का संचालन शिवजी करते हैं। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु जागते हैं और बैकुंठ चतुर्दशी तिथि पर भगवान शिवजी सृष्टि का भार फिर से भगवान विष्णु को सौंप देते हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार इस दिन शिवजी और विष्णुजी की विशेष पूजा करनी चाहिए।

  • बैकुंठ चतुर्दशी पर सुबह और शाम गणेशजी की पूजा करें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा और शिवलिंग की पूजा करें।  भगवान विष्णु को केसर, चंदन मिले जल से स्नान कराएं। चंदन, पीले वस्त्र, पीले फूल चढ़ाएं।
  • शिवलिंग को दूध मिले जल से स्नान के बाद सफेद आंकड़े के फूल, अक्षत, बिल्वपत्र अर्पित करें। दोनों भगवान को कमल फूल भी अर्पित करें।
  • दोनों देवतओं को दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाएं। दीप-धूप जलाएं। आरती करें। मंत्रों का जाप करें। 

विष्णु मंत्र 
पद्मनाभोरविन्दाक्ष: पद्मगर्भ: शरीरभूत्। महर्द्धिऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वज:।। 
अतुल: शरभो भीम: समयज्ञो हविर्हरि:। सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जय:।।
शिव मंत्र
वन्दे महेशं सुरसिद्धसेवितं भक्तै: सदा पूजितपादपद्ममम्।
ब्रह्मेन्द्रविष्णुप्रमुखैश्च वन्दितं ध्यायेत्सदा कामदुधं प्रसन्नम्।। 

Sources:-Dainik Bhasakar

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