देश में सबसे ज्यादा ग्रोथ वहीं होगा जहाँ ग्रोथ में गैप सबसे ज्यादा होगी। बिहार एक ऐसा राज्य है जहाँ ग्रोथ की सबसे ज्यादा आवश्यकता हैI आज बिहारियों के साथ जो बर्ताव देश के दूसरे राज्यों में हो रहा है वो वाकई में राष्ट्रीय चिंता का विषय है। विदेशों में बहुत बातें होती हैं भारतीयों के साथ हुए भेद भाव या डिस्क्रिमिनेशन की लेकिन अपने ही देश अपने ही देशवासियों के साथ यह कैसा बर्ताव? बिहारी शब्द एक गाली बनकर के रह गया है।

बिहारियों का सिर्फ इसलिये मज़ाक उड़ाया जाता है क्यूंकि वे बिहार से ताल्लुक रखते हैं। फ्रूट्स तब तक नहीं मिलेंगे जब तक रूट्स ठीक नहीं होंगे पर आज सवाल ये है की रूट्स यानि जड़ें कमज़ोर हुईं कैसे? तो रूट कमज़ोर होने के मुख्य कारण हम आपको बताते हैं।

पहला कारण ये है कि बिहार को एक बहुत बड़ा भौगोलिक नुकसान है कि वो एक लैंड लॉक राज्य है जहाँ न तो समुद्र हैं और ना ही कोई मुख्य बंदरगाह जिसके चलते बिहार को ग्लोबल एक्सेस नहीं मिलता और और ट्रांसपोर्टेशन की कॉस्ट बहुत बढ़ जाती है। एक क्षेत्र ऐसा है जहाँ हर साल बाढ़ आ जाती है और दूसरे क्षेत्र में सुखा पड़ जाता है जिसके वजह से लोगों को रोजगार के लिय पलायन करना पड़ता है।

दूसरा सबसे बड़ा कारण ये कि बिहार में कोई मुख्य उद्योग वाली कंपनियां निवेश नहीं करना चाहती हैं। हिंदुस्तान यूनिलीवर के अलावा कोई भी ब्लू चिप कंपनी बिहार में अपना उद्योग नहीं चला रही है। बिहार में उतर प्रदेश, बंगाल, मध्यप्रदेश, उड़ीसा जैसे राज्यों से ट्रक भर भर के सामान आता है लेकिन उन ट्रकों को वापस बिहार से खाली जाना पड़ता है। बिहार केवल ले रहा है दे नहीं रहा है कुछ भी।

पहले बिहार में सुगर मिल्स और फ़र्टिलाइज़र इंडस्ट्री हुआ करती थी लेकिन इकोसिस्टम ने साथ नहीं दिया तो वो भी थप पड़ गई। नहले पे दहला तो तब हुआ जब झारखंड बिहार से अलग हो गया और सारी टाटा, बोकारो, और धनबाद जैसी मुख्य इंडस्ट्री और माइंस झारखंड में चले गये। 1950 में आई फ्रेट इक्वलाइज़ेशन पॉलिसी की वजह से सभी राज्यों को ट्रांसपोर्टेशन में सब्सिडी मिलने लगी जिससे जो उद्योग जहाँ थे वही रह कर काम करने लगे और बिहार में कोई उद्योग आया ही नहीं और बिहार से संधाधनो को ढोते रहे।

शिक्षा में पिछड़ने के कारण रोजगार उत्पादन की क्षमता भी घटती गई और बिहार की अर्थ व्यवस्था भी ख़राब हो गई। 1980 में बिहार की अर्थव्यवस्था पंजाब से दोगुनी थी लेकिन आज पंजाब की अर्थव्यवस्था बिहार से तीन गुनी ज्यादा मजबूत है। बिहारियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि वो कुएं का मेढ़क बनकर के रह गये। रोजगार के नाम पर सरकारी नौकरी के अलावा कोई मुख्य साधन उन्हें सूझता ही नहीं है।

औसतन हर दस में से आठ बिहारियों को रोजगार के लिय सरकारी नौकरी ही चाहिए जिससे कोई व्यवसाय और स्टार्टअप शुरू होता ही नहीं है। 1991 के उदारीकरण के दौर में जहाँ बाकि राज्य विदेशों से निवेश और पूंजी की जुगाड़ में लगे हुए थे वहीं बिहार में जातिवाद की राजनीति अपने चरम पर थी और आज भी जाति की राजनीति के लिये ही जाना जाता है ना कि विकास की राजनीती के लिए।

बिहार में जनसंख्या वृद्धि दर और साक्षरता वृद्धि दर कभी समान हुआ ही नहीं जिससे भीड़ बढ़ती गई और कुशलता घटती गई। 2011 का सेन्सस डाटा कहता है कि बिहार में एक माँ औसत 5 बच्चे को जन्म देती है जो की देश के औसत 3 से दो ज्यादा है। बिहार की प्रति व्यक्ति आया मात्र 31000 रूपये हैं राष्ट्रीय आय प्रति व्यक्ति के दर से 75000 रूपये है।
ऐसा बिलकुल नहीं है कि बिहार में संभावनाए कम है। जरूरत है तो केवल दायरा बढ़ाने की और संभावनाओं पर ध्यान केन्द्रित करने की।

( एक बिहारी सब पर भारी को यह लेख प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी कर रहे रविरंजन ने भेजा है )

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