आरा के सिनेमाघर में चल रही थी ‘नागिन’ फिल्‍म, तभी सच में आ गया सांप; ‘डकैत’ के साथ खत्‍म हुई कहानी

जानकारी

 ‘नागिन’ अपने वक्‍त की सुपर हिट फिल्‍म थी। इसे लोगों ने सिनेमाघर और टीवी पर कई-कई बार देखा। पुरानी फिल्‍मों के शौकीन इसे आज भी देखते हैं। इस फिल्‍म से जुड़ा एक किस्‍सा है भोजपुर (आरा) जिले के जगदीशपुर स्थित सिनेमा हाल का। इस सिनेमा हाल में नागिन फिल्‍म के एक शो के दौरान पर्दे के पास सचमुच का सांप आ गया। इसके बाद तो वहां अजब ही नजारा हो गया। इस सिनेमा घर में पहली फिल्‍म ‘अंखियों के झरोखे से’ से लगी थी। ‘डकैत’ इस सिनेमा घर में चलने वाली आखिरी फिल्‍म थी। हम इस सिनेमा घर से जुड़े कई किस्‍सों के बारे में विस्‍तार से बताएंगे।

एक दौर में भोजपुरी सिनेमा को पहचान देने के लिए जगदीशपुर दुर्गा मंदिर रोड स्थित देवी चित्र मंदिर को जाना जाता था। पब्लिक की डिमांड के हिसाब से यहां नदिया के पार, दुल्हा गंगा पार के, पिया निरमोहिया जैसी सुपर हिट भोजपुरी फिल्म यहां न सिर्फ हाउसफुल चलीं, बल्कि भोजपुरी फिल्म पर्दे पर लगाने में देवी चित्र मंदिर को सबसे आगे माना जाता था। इन्हीं कारणों से बिहार में यह एक अलग स्थान रखता था। इस सिनेमा हाल का सफर ‘अंखियों के झरोखे से’ फिल्म से शुरू हुआ और शोले, डान, नागिन आदि सुपर हिट फिल्म लगने के बाद डकैत फिल्म से इसका सफर का अंत हुआ।

जगदीशपुर के दलीपपुर, कौरा, दावा के अलावा बक्सर जिले के भदवर, सोनवर्षा और रोहतास जिले के मलियाबाग जैसे गांवों से भी चलकर सिनेमा के प्रेमी यहा फिल्म देखने आते थे। प्रतिदिन तीन शो में पिक्चर चलती थी। तब पिक्चर देखने के लिए दो घंटे पहले ही पहुंच जाते थे सिनेमा प्रेमी। जैसे ही सिनेमा शुरू होता था लोग सीटी और तालियों की गड़गड़ाहट से फिल्म का स्वागत करते थे। सिनेमा शुरू होने से घंटों पहले टिकट लेने के लिए मारा-मारी शुरू हो जाती थी और लंबी लाइन लगती थी। पहले टिकट लेने की होड में लोग एक दूसरे से उलझ भी जाते थे। जब सिनेमा हाल में लाउड स्पीकर से जैसे ही पिक्चर के पहले गाना बजना शुरू होता था लोग समझ जाते थे कि टिकट काउंटर खुल गया है और टिकट कटाने के लिए सिनेमा हाल पहुंच जाते थे।

देवी चित्र मंदिर का उद्घाटन 1984 में हुआ था। बुजुर्ग सिनेमा प्रेमी अश्विनी राय बताते हैं कि पहले दिन सिनेमा प्रेमियों के लिए यहां शो निश्शुल्क रखा गया था और इसमें प्रवेश के लिण् दूर-दूर से लोग आए थे। एक दिलचस्प कहानी बयां करते हुए उन्होंने बताया कि जब नागिन फिल्म लगी थी, तब पिक्चर के बीच में ही एक दिन पर्दे पर सचमुच का सांप आ गया था, जिसके बाद आगे बैठने वाले दर्शकों में भगदड मच गई। तब पिक्चर को रोककर कर्मचारियों ने सांप को भगाया और फिल्म दोबारा शुरू हुई।

प्रतिदिन जगदीशपुर मे सिनेमा का प्रचार टमटम पर बैठकर होता था। टमटम के पीछे सिनेमा का बोर्ड लगा रहता था और एनाउंसर अनोखे अंदाज मे टमटम पर बैठकर माइक से प्रचार करता था। सिनेमा पर्दे पर चल रही होती थी इसी बीच बीच में अक्सर आपरेटर रूम में रील टूट जाती थी। जैसे ही रील टूटती थी सिनेमा के दर्शक हो हल्ला मचाना शुरू कर देते थे और जोर जोर से सीटी बजनी शुरू हो जाती थी। आपरेटर जल्दी जल्दी रील को जोड़कर पिक्चर शुरू करता था, तब जाकर हंगामा शांत होता था। यहां टिकट का दर तीन श्रेणी में थी। सबसे आगे बैठने वालो का जो फर्स्‍ट क्लास  कहा जाता था और इसके लिए दो रुपये 10 पैसे देने पड़ते थे। बीच में मिडिल क्लास के लिए ढाई रुपये और बालकानी का टिकट साढ़े तीन रुपये होता था।

कौन था सिनेमाघर का मालिक

जिस जमीन पर सिनेमाघर का निर्माण हुआ था उस जमीन के मालिक कामता स्वर्णकार बताते हैं कि डुमरांव निवासी अमरजीत जायसवाल को सिनेमाघर चलाने के लिए 30 वर्षों के लिए जमीन लीज पर दी गई थी। बिजली की अनियमित आपूर्ति और मनोरंजन कर बढ़ने से सिनेमा हाल सात वर्ष के अंदर ही बंद हो गया।

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