50 रुपए के नोट पर हंपी के रथ, ये है इतिहास, इसलिए मिली नोट पर जगह

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भारतीय नोट की अपनी एक विशेष पहचान है और वो है फोटो पर चस्पा गांधी जी की वो तस्वीर जो हर नोट पर एक जैसी मुस्कुराती आपको मिल जाएगी। आपने बचपन से लेकर जवानी तक इसी फोटो को नोट पर देखा होगा।

हां इसके साथ ही नोट के पिछले हिस्सों पर कई बार अलग-अलग तरह के चिन्हों, प्रतिकों और धरोहरों को भी देखा होगा। अब 50 का नया नोट जल्द ही मार्केट में आने वाला है, उसकी पहली तस्वीर भी सामने आ गई है, इसके पिछले भाग पर हंपी के रथ के तस्वीर अंकित होगी। लेकिन क्या आप जानते हैं, कि ये हंपी का रथ कहां है? और इससे जुड़ा ऐसा क्या इतिहास है, जो इसे नोट पर जगह दी गई है?



Demo pic- नोट के पिछले भाग पर छपी हंपी के रथ की तस्वीर





इस आने वाले नए नोट पर भारत की जिस धरोहर को जगह मिली है, वो रथ कोई आम रथ नहीं है, इसे हंपी रथ कहा जाता है। इसके पीछे का इतिहास बेहद ही रोचक और रहस्यमय है।

आपको बता दें, कि इस हंपी रथ को यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा दे रखा है। इतिहास में इसका जिक्र सम्राट अशोक के शासन काल में मिलता है।




हंपी से जुड़ा इतिहास

हम्पी का इतिहास शुरु होता है विजयनगर सम्राज्य से, जो मध्यकालीन हिन्दू राज्य हुआ करता था। विजयनगर की राजधानी हंपी था, जो कर्नाटक की तुंगभद्रा नदी किनारे बसा हुआ है। हंपी को पुराने वक्त में कई नामों से बुलाया जाता था, जैसे पम्पा क्षेत्र, भास्कर क्षेत्र, हम्पे, किष्किंधा आदी।

बता दें, कि हंपी नाम कन्नड शब्द हम्पे से पड़ा है, और हंपे शब्द तुंगभद्रा नदी के प्राचीन नाम ‘पम्पा’ से आया था। पुराणों में पम्पा का जिक्र ब्रह्मा जी की बेटी के तौर पर मिलता है।




सन् 1336 में हरिहर राय और बुक्का इन दो भाइयों ने मिलकर विजनगर को बसाया था। विजयनगर साम्राज्य बेहद संपन्न और धनी राज्य था। ये साम्राज्य कृष्णदेव राय के शासन में बहुत सपन्न और प्रचलित था, आपको शायद न पता हो, कि जिस बुद्धिमान तेनालीराम की कहानियां आपने बचपन में सुन रखी है, वो इन्हीं के दरबार में थे।

विजयनगर के ज्यादातर स्मारकों का निर्माण कृष्णदेव राय ने ही किया था। इस साम्राज्य का विस्तार मौजूदा कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के इलाकों तक हो गया था।




लेकिन, बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर के मुस्लिम राज्यों ने एकसाथ मिलकर सन 1565 में विजयनगर पर आक्रमण किया था, इस लडाई में विजयनगर साम्राज्य बुरी तरह हार गया। उसके बाद मुगलों की सेनाओं ने इस खूबसूरत शहर को बर्बाद कर दिया, इसी के साथ ही राजधानी हम्पी भी खंडहर में तब्दील हो गया।

राजा कृष्णदेव राय की मू्र्ति




हंपी से जुडे किस्से
हंपी के इस रथ को सन् 1509 में अपने राज्याभिषेक के वक्त राजा कृष्णदेव राय ने बनवाया था। राजा ने विट्ठल मंदिर का निर्माण कराया था, जिसका मुख्य आकर्षण इसकी खम्बे वाली दीवारें और पत्थरों से बना ये हंपी का रथ है। इस मंदिर की खास बात ये है, कि यहां म्यूजिकल पिलर्स हैं।

यहां ग्रेनाइट के 56 पिलर्स हैं जिन्हें सारेगामा पिलर्स भी कहते हैं। इन्हें से प्यार से थपथपाने पर इनमें से म्यूजिकल नोट्स निकलते हैं। जिन्हें अग्रेजों ने अपने शासनकाल में तुडवाकर ये जानने की कोशिश की थी कि पिलर्स में सोना तो नही छुपा है? ये टूटे हुए पिलर आज भी यहां मौजूद हैं।



Virupaksha Temple at Hampi





मंदिर के प्रांगण में गरुड़ की एक बड़ी मूर्ति और खूबसूरत पत्थर का रथ है, कहा जाता है कि इस रथ के पहिये उस वक्त घूमा करते थे, लेकिन इन्हें बचाने के लिए सीमेंट का लेप लगा दिया गया है। हम्पी के विरुपाक्ष मंदिर के सामने खुले में डायमंड मार्केट लगता था, जहां दुनिया के लोग हीरे खरीदने आते थे।

हम्पी में 500 साल पहले करीब 5 लाख लोग रहते थे। उस समय ये इटली रोम से भी ज्यादा खूबसूरत शहर था। 300 सालों तक यहां हमला करने की किसी की हिम्मत नहीं हुई थी। कहा जाता है कि यहां के गड्ढों में पिघला हुआ सोना भरा रहता था।



Hampi Ratha





पौराणिक ग्रंथ रामायण में भी हम्पी के बारे में बताया गया है, जिसमें राम जब लक्ष्मण के साथ सीता जी को ढूंढने निकले थे, तब राम बाली और सुग्रीव से मिलने हम्पी में आए थे, जिसका जिक्र रामायण में वानर राज्य किष्किन्धा की राजधानी के तौर पर किया गया है। और शायद यही वजह है कि यहां कई बंदर आज भी रहते हैं।

हम्पी को एशिया में सबसे बडा खुले स्मारकों वाला गुम हुआ शहर माना जाता है, इसकी बची हुए धरोहरों को देखकर पता लगाया जा सकता है कि 600-700 साल पहले ये शहर कितना सुंदर और भव्य था। हम्पी का इलाका करीब 25 किलोमीटर इलाके में फैला हुआ है।




जहां पत्थरों की भरामार है, इसके आलावा यहां भव्य मंदिर, महलों के तहखाने, प्राचीन बाजार, शाही मंच, दरबार, जलाशय आदि देखने लायक है। और आज हर साल यहां 15 लाख टूरिस्ट इस भव्य धरोहर को देखने आते हैं।









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