भारत के वे 5 शिक्षक जिनके महान कार्यों की चर्चा पूरे विश्व में होता है

जानकारी

Patna: शिक्षक हर रूप में असली हीरो हैं, क्योंकि वे कई हीरो का निर्माण करते हैं और यह बिना लाभ वाला काम है। वे अधिक से अधिक सितारे या नायक बनाते हैं और खुद वहीं रहते हैं। आज बात कर रहे देश के उन 5 शिक्षको का जिसने शिक्षा में लाया नया बदलाव

सावित्रीबाई फुले,ज्‍योतिबा फुले—-

भारत में पहली महिला शिक्षिका बन महिला सशक्तिकरण की मिसाल कायम करने वाली सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र स्थित सतारा के नायगांव में हुआ था। सावित्रीबाई फुले को देश के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रधानाचार्या बनने और पहले किसान स्कूल की स्थापना करने का श्रेय जाता है।सावित्रीबाई ने महिलाओं की शिक्षा और उनके अधिकारों की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया. तकरीबन डेढ़ सौ साल पहले सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं को पुरुषों के ही सामान अधिकार दिलाने की बात की थी।सावित्रीबाई ने न सिर्फ महिला अधिकार पर काम किया बल्कि उन्होंने कन्या शिशु हत्या को रोकने के लिए प्रभावी पहल भी की ,उन्होंने न सिर्फ अभियान चलाया बल्कि नवजात कन्या शिशु के लिए आश्रम तक खोले. जिससे उनकी रक्षा की जा सके।

सावित्रीबाई फुले बनीं थी देश के पहले बालिका विद्यालय की प्रिंसिपल,
सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) की शादी 9 साल की उम्र में ही ज्योतिबा फुले से हो गई थी। उनके पति ज्‍योतिबा फुले (Jyotiba Phule) समाजसेवी और लेखक थे। ज्‍योतिबा फुले ने स्त्रियों की दशा सुधारने और समाज में उन्‍हें पहचान दिलाने के लिए उन्‍होंने 1854 में एक स्‍कूल खोला। यह देश का पहला ऐसा स्‍कूल था जिसे लड़कियों के लिए खोला गया था. लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया।सावित्रीबाई (Savitribai) फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल बनीं। कुछ लोग आरंभ से ही उनके काम में बाधा बन गए. लेकिन ज्‍योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का हौसला डगमगाया नहीं और उन्‍होंने लड़कियों के तीन-तीन स्‍कूल खोल दिए।

सावित्रीबाई क्यों एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं ?
जब सावित्रीबाई (Savitribai Phule) कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फेंका करते थे. सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुंच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं।

अन्नपूर्णा मोहन—-

सरकारी स्‍कूल तो आपने देखे ही होंगे। वहां के टीचर्स को भले ही सरकार अच्‍छी खासी सैलरी दे रही हो लेकिन स्‍टूडेंट्स को बेहतर शिक्षा देने के लिए सरकारें वहां के बच्‍चों के लिए कोई बड़ी सुविधा छोड़िए मूलभूत सुविधाएं भी नहीं दे पाती। ऐसे ही एक सरकारी स्‍कूल की टीचर ने जब अपने स्‍टूडेंट्स को बेहतर और हाईटेक ऐजूकेशन देने के लिए अपने सारे जेवर बेच डाले तो उसे देख पूरी दुनिया कह रही है कि टीचर हो तो ऐसा।

अपने सारे जेवर बेचकर अन्नपूर्णा ने बदल दी बच्चों की जिंदगी

किसी सरकारी स्कूल के क्लासरूम में लगा स्मार्ट डिजिटल बोर्ड आपने पिछली बार कब देखा था। आप कहेंगे कि क्या मजाक कर रहे हो। सरकारी प्राइमरी स्कूलों में बैठने के लिए अच्छी कुर्सी मेज मिल जाए तो बड़ी बात है स्मार्ट डिजिटल टीचिंग बोर्ड तो वहां के लिए एक सपना ही है। वैसे तमिलनाडु के विल्लुपुरम में पंचायत यूनियन प्राइमरी स्कूल देखने के बाद आप ऐसा नहीं कहेंगे। यहां बच्चों के बैठने के लिए प्राइवेट स्कूलों जैसा बेहतरीन फर्नीचर तो है ही, साथ में यहां के बच्चे फर्राटेदार इंग्लिश में बात करते हुए स्मार्ट एजूकेशन लेते हैं। यह सब कुछ पॉसिबल हुआ है यहां की टीचर अन्नपूर्णा मोहन के दिल छू लेने वाले प्रयासों से। अन्नूपूर्णा ने अपने स्टूडेंट्स को बेहतरीन एजूकेशन देने के लिए अपने सारे जेवर बेच डाले और उन पैसों से उन्होंने इस स्कूल के बच्चों को बेहतरीन फर्नीचर, किताबें, खूबसूरत क्लासरूम और स्मार्ट डिजिटल टीचिंग उपलब्ध कराई है।

अन्नपूर्णा को देखकर कहना पड़ेगा कि सरकारी से लेकर प्राइवेट स्कूलों में अगर ऐसे ही सच्चे, ईमानदार और डेडीकेटेड टीचर मौजूद हों तो हमारे बच्चों का भविष्य वाकई शानदार होगा।

रणजीत सिंह डिसले—–

महाराष्ट्र के सोलापुर के सरकारी स्कूल के शिक्षक रणजीत सिंह डिसले को ग्लोबल टीचर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। लंदन में एक ऑनलाइन समारोह में उनके चुने जाने की घोषणा अभिनेता स्टीफन फ्राई ने की थी। पहली बार भारत के किसी शिक्षक को यह अवार्ड मिला है। यूनेस्को और लंदन के वार्की फाउंडेशन द्वारा दिए जाने वाले इस पुरस्कार में उन्हें 7 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। विश्व के 140 देशों से 12 हजार से अधिक शिक्षकों में से डिसले को चुना गया है.

डिसले ने अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर पहली बार किताबों में क्यूआर कोड शुरू करने की पहल की। उन्होंने हर पाठ और कविताओं का क्यूआर कोड बनाया है। इतना ही नहीं साल 2017 में महाराष्ट्र सरकार को ये प्रस्ताव दिया कि सारा सिलेबस इससे जोड़ दिया जाए। इसके बाद डिसले की ये बात पहले प्रायोगिक स्तर पर चली और तब जाकर राज्य सरकार ने घोषणा की कि वह सभी श्रेणियों के लिए राज्य में क्यूआर कोड पाठ्यपुस्तकें शुरू करेगी। अब तो एनसीईआरटी ने भी ये घोषणा कर दी है।

आनंद कुमार—-

शिक्षा के क्षेत्र में पटना के आनंद कुमार और उनकी संस्था ‘सुपर 30’ को कौन नहीं जानता। हर साल आईआईटी रिजल्ट्स के दौरान उनके ‘सुपर 30’ की चर्चा अखबारों में खूब सुर्खियाँ बटोरती हैं। आनंद कुमार अपने इस संस्था के जरिए गरीब मेधावी बच्चों के आईआईटी में पढ़ने के सपने को हकीकत में बदलते हैं। सन् 2002 में आनंद सर ने सुपर 30 की शुरुआत की और तीस बच्चों को नि:शुल्क आईआईटी की कोचिंग देना शुरु किया। पहले ही साल यानी 2003 की आईआईटी प्रवेश परीक्षाओं में सुपर 30 के 30 में से 18 बच्चों को सफलता हासिल हो गई। उसके बाद 2004 में 30 में से 22 बच्चे और 2005 में 26 बच्चों को सफलता मिली। इसीप्रकार सफलता का ग्राफ लगातार बढ़ता गया। सन् 2008 से 2010 तक सुपर 30 का रिजल्ट सौ प्रतिशत रहा।

आज आनंद कुमार राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय मंचों को संबोधित करते हैं। उनके सुपर 30 की चर्चा विदेशों तक फैल चुकी है। कई विदेशी विद्वान उनका इंस्टीट्यूट देखने आते हैं और आनंद कुमार की कार्यशैली को समझने की कोशिश करते हैं। आज आनंद कुमार का नाम पूरी दुनिया जानती है और इसमें कोई शक नहीं कि आनंद कुमार देश का गौरव हैं।

आरके श्रीवास्तव—–

बिहार राज्य के रोहतास जिले के आरके श्रीवास्तव की शैक्षणिक कार्यशैली को कौन नही जानता। सिर्फ 1 रूपया गुरु दक्षिणा में 540 आर्थिक रूप से गरीब स्टूडेंट्स को बना चुके है इंजीनियर । सफल होने के बाद स्टूडेंट्स और उनके माता-पिता से लेते है 1 रूपया गुरु दक्षिणा ।
आर के श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्य शैली और पाठशाला “सुपर थर्टी” से कम सुपर नहीं है। सिर्फ 1 रू गुरू दक्षिणा लेकर सैकड़ों गरीबों को आईआईटी, एनआईटी, बीसीईसीई, एनडीए सहित देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला दिलाकर उनके सपने को पंख लगाया है। संसाधन की कमी के बाबजूद आर के श्रीवास्तव ने पढ़ाना आरंभ कर, आज जो मुकाम हासिल किया है और जिस तेजी से उस पथ पर अग्रसर होते हुए, गरीब स्टूडेंट्स को इंजीनियर बना रहे हैं, उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी आर के श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्यशैली से काफ़ी प्रभावित होकर प्रशंसा कर चुके हैं।

वहीं, आर के श्रीवास्तव के शैक्षणिक आँगन से सिर्फ 1रू गुरू दक्षिणा में छात्र शिक्षा ग्रहण कर इंजीनियर तो बन ही रहे हैं, वहीं कई छात्र NDA में सफल हो भारतीय सेना के विभिन्न अंगों में सेवा देने के लिये भी सफल हो रहे हैं, इसके अलावा श्रीवास्तव अपने माँ के हाथों प्रत्येक वर्ष 50 गरीब स्टूडेंट्स को निःशुल्क किताबें बंटवाने के पुनीत कार्य भी करते हैं।

ऐसे कई सारे सामाजिक कार्यों के लिए भी आरके श्रीवास्तव मशहूर हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इनके द्वारा चलाया जा रहा “Wonder Kids Program” और “Night Classes” अद्भुत है। Google boy “Kautilya Pandit” के गुरू के रूप में भी देश इन्हें जानता है।

कचरे से खिलौने बनाकर सैकड़ों स्टूडेंट्स को गणित सिखा चुके हैं
मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव यानी गणित पढ़ाने का दीवाना, पूरी रात लगातार 12 घण्टे स्टूडेंट्स को गणित का गुर सिखाते, वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव जादुई तरीके से खेल-खेल में गणित का गुर सिखाने के लिए मशहूर हैं। चुटकले सुनाकर खेल-खेल में पढ़ाते हैं। उनकी पढ़ाई की खासियत है कि वह बहुत ही स्पष्ट और सरल तरीके से समझाते हैं। सामाजिक सरोकार से गणित को जोड़कर, चुटकुले बनाकर सवाल हल करना आरके श्रीवास्तव की पहचान है।

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