पटना यूनिवर्सिटी की स्थापना 1 अक्टूबर 1917 को हुई थी। इस विश्वविद्यालय को पूर्वी भारत का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था। इस विश्वविद्यालय का गौरवशाली इतिहास रहा है। यहां पढ़ाई में कीर्तिमान बने तो कई छात्र आंदोलन भी हुए। पटना यूनिवर्सिटी में एक ऐसा छात्र आंदोलन हुआ था जिसको शांत करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को आना पड़ा था।

1955 में पटना विश्वविद्यालय के छात्र जिन बसों से पढ़ने के लिए आते थे उसका किराया बढ़ा दिया गया। बस के भाड़ा में 25 पैसे की वृद्दि की गयी थी। बीएन कॉलेज के छात्रों ने इसका विरोध किया। इसके बाद अन्य कॉलेज के छात्र भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गये। देखते –देखते एक बड़ा छात्र आंदोलन खड़ा हो गया। परिवहन विभाग किराया कम करने के लिए तैयार न था। छात्र भी आंदोलन खत्म करने को तैयार न थे। 12 अगस्त 1955 को छात्रों के विशाल जुलूस पर पुलिस ने गोली चला दी। इस पुलिस फायरिंग में छात्र नेता दीनानाथ पांडेय की मौत हो गयी। इसके बाद हालात और बिगड़ गये। पुलिस की बर्बरता के खिलाफ छात्रों में इतना गुस्सा भर गया कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार डर गयी। बिहार के इस छात्र आंदोन की गूंज दिल्ली तक पहुंच गयी।

आखिरकार बिहार के व्यापक छात्र आंदोलन को शांत करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को पटना आना पड़ा। 30 अगस्त 1955 को नेहरू पटना आये। पटना के छात्र बिहार के परिवहन मंत्री को हटाने और दीनानाथ पांडेय की मौत की न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे। नेहरू ने पटना के गांधी मैदान में एक सभा की और आंदोलन के लिए प्रेस और भीड़ को जिम्मेवार ठहरा दिया। नेहरू ने न्यायिक जांच की मांग खारिज कर दी। नेहरू के इस भाषण से जयप्रकाश नारायण को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने नेहरू के वक्तव्यों के खिलाफ एक प्रेस रिलीज जारी किया जो पटना के अखबारों में काफी प्रमुखता से छपा था। जेपी ने नेहरू के इस रवैये के लिए आलोचना की कि वे आंदोलन के लिए कम्युनिस्टों को क्यों जिम्मवार ठहरा रहे हैं। कांग्रेस के खिलाफ बिहार में ये पहला बड़ा जनआंदोलन था।

छात्रों के गुस्से का असर 1957 के दूसरे विधानसभा चुनाव में देखने को मिल गया। कांग्रेस की जीत तो हुई लेकिन तत्कालीन परिवहन मंत्री चुनाव हार गये थे। पटना गोली कांड के लिए छात्र तत्कालीन परिवहन मंत्री को जिम्मेवार मानते थे। उनको हराने के लिए छात्रों ने एक जोरदार अभियान चलाया था।

इसी समय से जेपी पटना विश्वविद्यालय के छात्रों के सबसे प्रिय नेता बन गये। जेपी ने छात्रों को न्याय दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नेहरू तक का विरोध किया था। 1974 में जेपी ने पटना यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ मिल कर देश में बहुत बड़ा राजनीतिक बदलाव किया था।

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