दहेज प्रथा और अनावश्यक शादी खर्च की दिशा में कढुआ शादी एक सकारात्मक पहल के रूप में देखी जा रही है। कढुआ शादी को धीरे-धीरे समाज के सभी वर्गों के लोग अपनाने लगे हैं। मुख्य रूप से इस प्रकार की शादी अभी व्यवसाई वर्ग के लोग के बीच प्रचलन में है। इस शादी में वधू ही अपने रिश्तेदारों के साथ विवाह स्थल पर जाती है और वहां शादी की सारी रस्में बिना किसी तामझाम के एक ही रात में संपन्न हो जाते हैं। 

दहेज प्रथा पर है करारा प्रहार
कढुआ शादी दहेज प्रथा पर करारा प्रहार है। व्यवसायिक वर्ग में माहुरी, मारवाड़ी, बनिया, तेली इत्यादि समाज के लोग इसी शादी को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसको लेकर माहुरी पंचायत भवन के अध्यक्ष ओंकार सेठ, चुनाव प्रभारी रितेश सेठ इत्यादि बताते हैं कि इस प्रकार के शादी के चलन में आने से दहेज प्रथा में काफी कमी आई है। शादी का खर्च भी कम होता है और समय की भी बचत होती है।
इस तरह की शादी में वधू पक्ष के लोग वर पक्ष के यहां जाते हैं जहां मैरिज हॉल में सभी जुटते हैं और फिर एक ही रात में शादी के सारे विधि विधान संपन्न हो जाते हैं फिर दुल्हन को लेकर दूल्हा अपने घर चला जाता है। इसकी वजह से तिलक, फलदान और बेवजह की रस्मों का खर्चा बचता है।
दुल्हन के यहां गाजे-बाजे के साथ बारात ले जाने का खर्च बचता है। रिशेप्शन का खर्च बच जाता है। सारे समारोह एक ही रात में एक ही साथ संपन्न हो जाते हैं। खर्च कम होने से वर-वधू दोनों पक्ष के पैसे बच जाते हैं और बिल्कुल साधारण तरीके से शादी संपन्न हो जाती है। 
ओमकार सेठ कहते हैं कि शेखपुरा जिले में साल भर में सौ से अधिक शादियां इसी तरह होती है। इस शादी में वर पक्ष के यहां जब वधू पक्ष के लोग आते हैं तो वह अपने रिश्तेदारों के साथ बारात की तरह ही आते हैं। उनका स्वागत किया जाता है। साथ ही साथ शादी के खर्च को आधा-आधा दोनों पक्ष के लोग आपस में बांट लेते हैं।


दूल्हे के घर से बारात निकल कर मैरिज हॉल पहुंचती है और वहीं पर शादी संपन्न होती है। इस तरह की शादी में अपव्यय बहुत ही कम होता है। इस प्रकार की शादी में पैसे की बचत के साथ साथ समय की भी काफी बचत होती है। आम तौर पर शादी विवाह के समारोह एक सप्ताह तक चलते हैं परंतु इसमें एक ही रात में सारे कार्यक्रम संपन्न हो जाते हैं।

Sources:-Dainik Jagran

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