राजधानी सहित पूरे प्रदेश में चैती छठ महापर्व का चार दिवसीय अनुष्ठान मंगलवार से शुरू होगा। व्रती नहाय-खाए से अनुष्ठान का संकल्प लेंगे। गंगा घाटों पर गंगा स्नान के बाद लौकी की सब्जी व अरवा चावल ग्रहण किया जाएगा। घाटों पर प्रसाद के लिए गेहूं धोए और सुखाए जाएंगे। खरना और अर्घ्य के प्रसाद के लिए श्रद्धालु टिन और डिब्बों में गंगाजल भी भरेंगे। भगवान भास्कर को सायंकालीन अर्घ्य 11 अप्रैल और 12 अप्रैल को उदयीमान सूर्य को अर्घ्य के साथ अनुष्ठान संपन्न होगा। बिहार में चैत्र मास में भी छठ पूरी आस्था, निष्ठा व धूमधाम से मनायी जाती है। चैती छठ को लेकर गंगा घाटों पर साफ-सफाई जोरों पर चल रही है। 

आरोग्यता, संतान एव मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए सूर्योपासना
ज्योतिषाचार्य पीके युग के मुताबिक सूर्य उपासना के इस पर्व में आरोग्यता, संतान एवं मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान भास्कर की उपासना व्रती करेंगे। छठ महापर्व खासकर शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का पर्व है। वैदिक मान्यता है कि नहाए-खाए से सप्तमी के पारण तक उन भक्तों पर षष्ठी माता की कृपा बरसती है, जो श्रद्धापूर्वक व्रत करते हैं।

चैती छठ महापर्व
नहाय-खाए-नौ अप्रैल
खरना-लोहंडा-10 अप्रैल
सायंकालीन अर्घ्य-11 अप्रैल
प्रात:कालीन अर्घ्य-12 अप्रैल 

व्रती गंगास्नान करके लौकी की सब्जी,अरवा चावल ग्रहण करेंगे
ज्योतिषाचार्य पूनम वैश्य ने बताया कि  नहाय-खाए में मंगलवार को व्रती लौकी की सब्जी और अरवा चावल का प्रसाद ग्रहण करेंगे। छठ में इसका खास महत्व है। वैदिक मान्यता है कि इससे पुत्र की प्राप्ति होती है तो वैज्ञानिक मान्यता है कि गर्भाशय मजबूत होता है। व्रती बुधवार को खरना करेंगे। कद्दू में लगभग 96 फीसदी पानी होता है। इसे ग्रहण करने से कई तरह की बीमारियां खत्म होती हैं। वहीं चने की दाल भी खायी जाती है। मान्यता है कि चने की दाल बाकी दालों में सबसे अधिक शुद्ध है। खरने के प्रसाद में ईख का कच्चा रस, गुड़ के सेवन से त्वचा रोग, आंख की पीड़ा, शरीर के दाग-धब्बे समाप्त हो जाते हैं।  

चैती छठ शरीर को शुद्ध रखने का भी पर्व है
ज्योतिषाचार्य विपेंद्र झा माधव के अनुसार चैती छठ शरीर को शुद्ध रखने का भी पर्व है। चार दिवसीय अनुष्ठान के पहले दिन नहाय-खाय में स्नान से शरीर को शुद्ध किया जाता है। शुद्ध भोजन ग्रहण किया जाता है। अगले दिन खरना पर व्रत रखा जाता है यानी एक समय ही भोजन के रूप में खीर-रोटी खायी जाती है। फिर षष्ठी को पूरी तरह निराहार व निर्जला रहा जाता है। दरअसल वसंत और शरद ऋतु संक्रमण का काल माना जाता है। इसमें बीमारी का प्रकोप ज्यादा होता है। इसलिए बीमारी के प्रकोप से बचाव के लिए आराधना व उपासना पर जोर दिया गया है। तन-मन स्वस्थ रखने के लिए व्रत व पूजा-अर्चना की जाती है। 

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