बिहार की सबसे बड़ी पूजा छठ है. आस्था के महापर्व के नाम से जाना जाने वाला छठ पूरे बिहार में बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है. एक बिहारी की पहचान, उसके घर लौटने की वजह, छठ अपने आप में लाखों कहानियां समेटता है. छठ पर्व के आगाज़ की कई कहानियाँ समाज में प्रचलित हैं. रामायण से लेकर महाभारत तक छठ की अलग अलग कहानियां कहता है. आइये छठ से जुड़ी कुछ रोचक कहानियों को जानते हैं;

भगवान राम और माता सीता ने किया था छठ : रामायण के अनुसार कहा गया है कि लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की थी. उन्होनें सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था.

कर्ण ने किया था छठ : एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी. सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की. कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे, वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे. सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे. आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है.

द्रौपदी ने किया था छठ : माना जाता है कि जब पांडव जुए में समस्त राजपाट हार गए थे तब द्रौपदी ने छठ किया था. जिसके बाद सूर्ये देव के ही आशीर्वाद से पांडवों को उनका राजपाट वापस मिल सका था.

राजा प्रियवद ने किया था छठ : एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनीको यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी. इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परन्तु वह मृत पैदा हुआ. प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे. उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ. हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी.अब कहानियां चाहें कुछ भी हो मगर छठ बिहार में आस्था का सबसे बड़ा पूजन माना जाता रहा है और आगे भी माना जाता रहेगा।

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