4 R

देशभर के साथ ही मिथिलांचल में भी प्रकाश पर्व दीपावली का विशेष महत्व है। यहां इस दिन घर-घर लक्ष्मी व गणेश के साथ भगवान राम और माता सीता की पूजा की जाती है। सीता जी मिथिला की बेटी थीं और भगवान राम रावण वधकर माता सीताजी को आज के ही दिन सकुशल अयोध्या लेकर लौटे थे। इसको लेकर यहां दीपावली के दिन घर घर दीप जलाकर खुशियां मनाई जाती हैं। दीपावली की तैयारियों को लेकर महिलाएं एक माह पूर्व से ही घरों की सफाई में लग जाती हैं। पूजा घर को सुंदर ढंग से सजाया जाता है।


दीपावली-पूजन में उपयोग की जाने वाली वस्तुएं भक्त को लक्ष्मी की स्थाई कृपा दिलवाती हैं।

सामान्य पूजन सामग्री – (दीपक, प्रसाद, कुमकुम, फल-फूल आदि) के अतिरिक्त ऐसी दस चीजें जो आपको लक्ष्मी की स्थाई कृपा दिलवाती हैं।

पान और चावल :– ये भी दीप पर्व के शुभ-मांगलिक चिह्न हैं। पान घर की शुद्धि करता है तथा चावल घर में कोई काला दाग नहीं लगने देता।

वंदनवार :- आम या पीपल के नए कोमल पत्तों की माला को वंदनवार कहा जाता है। इसे दीपावली के दिन पूर्वी द्वार या मुख्य पर बांधा जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि समस्त देवी-देवता इन पत्तियों की सुगंध से आकर्षित होकर आपके घर में प्रवेश करते हैं। ऐसी मान्यता है कि दीपावली की वंदनवार पूरे 31 दिनों तक बांधी रखनी चाहिए।

स्वास्तिक :- किसी भी पूजन कर्म में स्वास्तिक का चिह्नï अवश्य बनाया जाता है। स्वास्तिक की चार भुजाएं उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों दिशाओं को दर्शाती हैं। इसके साथ ही ये चार भुजाएं ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रमों का प्रतीक भी मानी गई हैं। यह चिन्ह केसर, हल्दी, या सिंदूर से बनाया जाता है।

कौड़ी :- लक्ष्मी पूजन की सजी थाली में कौड़ी रखने की पुरानी परंपरा है, क्योंकि यह धन और श्री का पर्याय है। कौड़ी को तिजौरी में रखने से लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है।

लच्छा या धागा :- यह मांगलिक चिह्नï संगठन की शक्ति का प्रतीक है, जिसे पूजा के समय कलाई पर बांधा जाता है।

तिलक :- पूजन के समय तिलक लगाया जाता है ताकि मस्तिष्क में बुद्धि, ज्ञान और शांति का प्रसार हो। कोई भी पूजन कर्म तिलक के बिना पूरा नहीं होता है।

बताशे या गुड़ :-
ये भी दिवाली पर्व के मांगलिक चिह्न हैं। लक्ष्मी-पूजन के बाद गुड़- बताशे का दान करने से धन में वृद्धि होती है। घर-परिवार में सुख और समृद्धि का विस्तार होता है।

ईख या गन्ना :- लक्ष्मी के ऐरावत हाथी की प्रिय खाद्य-सामग्री ईख है। दीपावली के दिन पूजन में ईख शामिल करने से ऐरावत प्रसन्न रहते हैं और उनकी शक्ति व वाणी की मिठास हमारे घर में फैलती है।



प्रत्येक घर में बनाई जाती है रंगोली

मिथिलांचल में दीपावली पर घर में रंगोली बनाने की भी परम्परा है। लक्ष्मी पूजन के स्थान तथा प्रवेश द्वारा व आंगन में रंगों के संयोजन द्वारा धार्मिक चिन्ह कमल, स्वास्तिक, कलश, फूलपत्ती आदि अंकित कर रंगोली बनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि देवी लक्ष्मी रंगोली की ओर जल्दी आकर्षित होती है। रंगोली बनाने का काम घर की महिलाएं व बालिका करती है। इसमें पहले चावल के साथ घरेलू प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता था। लेकिन अब बाजार में उपलब्ध रंगों का भी उपयोग किया जाने लगा है। शहर के बुद्धनगर निवासी मिथिला पेंटिंग की ख्याति प्राप्त कलाकार किशोरी ठाकुर ने बतायी कि रंगोली शुभ का प्रतीक है। मिथिलांचल में प्राचीन काल से दीपावली के अवसर पर घर के मुख्य द्वार व आंगन में रंगोली बनाने की परंपरा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here