पटना: बिहार में क्यों मनाया जाता है छठ पूजा का पर्व, क्या है इसका इतिहास- भारत के प्रमुख भौगोलिक और सांस्कृतिक त्योहारों (लोक त्योहारों) में से एक है छठ पूजा। इसकी मान्यता वैदिक काल से ही है, इसीलिए यह प्राचीन परंपराओं का धनी पर्व है। अगर आप भी इस त्यौहार के बारे में जानना चाहते हैं और पता करना चाहते हैं कि क्यों मनाया जाता है छठ पूजा का पर्व तो पढ़िए ।

बिहार में क्यों मनाया जाता है छठ पूजा का पर्व और क्या है इसका इतिहास?

भारत में छठ पूजा का पर्व

भारत में कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इस त्यौहार की धूम मची रहती है। पहले यह त्यौहार सिर्फ बिहार में मनाया जाता था लेकिन आज यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, भारत के उत्तर-पूर्वी इलाकों और नेपाल में भी प्रसिद्ध हो चुका है। बिहार की बेटियां जहां-जहां गईं, वहां-वहां इस त्यौहार की सौगात अपने साथ ले गईं और यही वजह है कि आज यह त्यौहार पटना के घाट से लेकर देश विदेश के घाट तक पहुंच चुका है। भारत में लोग सूर्य देव की पूजा करते हुए छठ मैया को प्रसन्न करते हैं और अपने बच्चों की रक्षा का वरदान मांगते हैं।

बिहार में छठ पूजा

बिहार में यह त्यौहार काफी प्रसिद्ध है जिसको लोग दीपावली से भी अधिक महत्व देते हैं। बिहार में छठ का त्यौहार 4 दिन का होता है जो नहाए खाए के साथ शुरू होता है। छठ के पहले दिन सभी मौसमी फलों को इकट्ठा करके छठ माता के लिए विभिन्न पकवान तैयार किए जाते हैं। दूसरे और तीसरे दिन उगते हुए और डूबते हुए सूर्य को जल देकर उनकी पूजा की जाती है, भजन गाए जाते हैं और इस तरह प्रसाद वितरण के साथ यह पर्व मनाया जाता है। बिहार में छठ पूजा का प्रचलन कैसे शुरू हुआ इस प्रश्न के जवाब में महाभारत के कर्ण की पूजन विधि के बारे में जानना जरूरी है।

दरअसल, भौगोलिक रूप से करण का संबंध बिहार के भागलपुर से है। सूर्यपुत्र कर्ण पूरी श्रद्धा के साथ सूर्य देव का पूजन करते थे और पानी में कमर तक घंटों खड़े रहकर सूर्य भगवान को अर्घ्य दिया करते थे। षष्ठी और सप्तमी की तिथि को वे विशेष अर्चना करते थे और सूर्य देव की कृपा उन पर हमेशा बनी रहती थी। मान्यता है कि छठ पर अर्घ्य दान की परंपरा तभी से प्रचलित हुई है।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो भारत का उत्तरी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र कृषि प्रधान है और कृषि सूर्य पर निर्भर करती है। इसीलिए भी सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यह माध्यम है। भारत में हमेशा से ही प्रकृति को पूजते हैं। सूर्यदेव को जल देकर छठ पूजा का प्रचलन भी इसीलिए है।

छठ पूजा क्या है और कौन हैं छठ माता

छठ पूजा सूर्य उपासना पर आधारित पर्व है। हिंदू धर्म के अनुसार छठ मैया भगवान सूर्य की छोटी बहन हैं। छठ माता लाड़ली होने के कारण छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाती है और इन को खुश करने के लिए सूर्य देव को प्रसन्न किया जाता है। इनकी पूजा-अर्चना गंगा, यमुना घाट या किसी नदी सरोवर जैसे जलाशयों के घाट पर ही की जाती है। छठ पूजा बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए की जाती है क्योंकि छठ मैया बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। छठ पर स्त्री-पुरुष सूर्य देव और षष्ठी देवी को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं और संतान की दीर्घायु की कामना करते हैं। इस व्रत में गंगा-स्नान का भी विशेष महत्व है।

हमारे मार्कंडेय पुराण में वर्णित है कि प्रकृति देवी जो सृष्टि की अधिष्ठात्री है उन्होंने स्वयं को 6 भागों में विभाजित कर लिया है। इन्हीं देवी का छठा अंश ब्रह्मा की मानस पुत्री है जो सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जानी जाती है। पुराणों के जानकारों का तो यहां तक कहना है कि नवरात्रि के छठे दिन पूजी जाने वाली कात्यायनी देवी भी यही हैं। प्रार्थना करने पर यह देवी बच्चों की रक्षा तो करती ही हैं, साथ ही उन्हें स्वास्थ्य, सफलता, और लंबी आयु का वरदान भी देती है।

छठ महापर्व

इस व्रत को रखने के कुछ विशेष और कड़े नियम हैं जिन को ध्यान में रखते हुए ही यह व्रत रखा जाता है। इस में सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जाता है तथा 3 दिन तक भोजन और जल ग्रहण नहीं किया जाता है। इन नियमों के कारण और छठ माता पर श्रद्धा के कारण ही इसको महापर्व भी कहा जाता है।

छठ पर्व क्यों

यह पर्व बच्चों के लिए मनाया जाता है और जिन स्त्रियों की संतान नहीं होती वे संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत रखती हैं। क्यों मनाया जाता है छठ पूजा का पर्व इस बात को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध राजा प्रियव्रत की कथा है। राजा प्रियव्रत और उनकी रानी मालिनी के कोई संतान नहीं थी, फिर कश्यप ऋषि के कहने पर उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। प्रसाद में मिली हुई खीर खाकर रानी गर्भवती हुई परंतु 9 महीने पश्चात जो पुत्र पैदा हुआ वह मृत पैदा हुआ। यह देखकर राजा प्रियव्रत व्याकुल हो उठे और रोते-रोते प्राण त्यागने का प्रण करने लगे। तभी वहां पर एक देवी प्रकट हुई जिन्होंने राजा को समझाया कि मैं षष्ठी देवी हूं और यदि तुम मेरी पूजा करो तो मैं तुम्हें पुत्र दान दे सकती हूं। राजा ने देवी के बताए अनुसार व्रत किया और सभी को इस व्रत को करने के लिए प्रेरित किया। कहते हैं तभी से छठ माता की पूजा की शुरुआत हुई।

एक दूसरी कथा इस प्रकार है कि जब श्री राम और माता सीता वनवास से लौटे तो उन्होंने रावण के वध के प्रायश्चित के लिए राजसूर्य यज्ञ किया। पूजा के लिए वहां पर आमंत्रित हुए मुद्गल ऋषि ने मां सीता को शुक्ल पक्ष की छठ को भगवान सूर्य की पूजा करने का आदेश दिया। मुद्गल ऋषि के आश्रम में 6 दिनों तक रहते हुए सीता माता ने सूर्य को अर्घ्य दिया और उनकी पूजा की और तभी से छठ के दिन सूर्य को जल देने की प्रथा प्रारंभ हुई।

द्रौपदी ने भी इस व्रत को किया था ताकि उनके पतियों को राजपाट की दोबारा प्राप्ति हो सके।

छठ माता को लेकर एक और कथा है कि वेदमाता गायत्री का जन्म षष्ठी तिथि को सूर्यास्त और सप्तमी तिथि को सूर्योदय बीच हुआ था। बालकों की रक्षा करने वाली देवी भगवान विष्णु की द्वारा रची हुई माया हैं। इन्हीं सब बातों के लिए इस त्यौहार का विशेष महत्व है।

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