ठीक 75 साल पहले 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से देश की पहली अस्थायी सरकार बनाई थी। इसके 75 साल पूरे होने पर आज यानी रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लालकिले पर झंडा फहराएंगे। बिहार के भागलपुर की रहने वाली 86 साल की भारती चौधरी आशा आजाद हिंद फौज का हिस्सा थीं, सरकार को भी करीब से देखा। नेताजी के साथ अपने अनुभव और ट्रेनिंग के दिनों को भारती आज भी याद करती हैं। उनसे बातचीत के प्रमुख अंश…


आखिरी बार नेताजी ने पूछा था- डर तो नहीं लग रहा; मैंने कहा- डर नहीं लगता:

15 साल की उम्र से मेरी ख्वाहिश थी कि देश के लिए लड़ूं। 1943 में सुभाषचंद्र बोस टोक्यो आए। मां मुझे और मेरी बहन को लेकर उनसे मिलने गई। मां ने नेताजी से कहा, मेरी बेटी को भी अपनी फौज में शामिल कर लीजिए। मैं छोटी थी, नेताजी ने मुझे देखा और आंखों में आंखें डालकर पूछा- देश के दुश्मनों को गोली मार सकोगी? देश के लिए गोली खा सकोगी? मैंने कहा- हां, बिल्कुल।

वे बोले- अभी तुम छोटी हो, बाद में सेना में शामिल करूंगा। एक साल बाद नेताजी फिर जापान आए। मैं फिर उनसे मिलने गई। इस बार उन्होंने मुझे रेजीमेंट में शामिल कर लिया। रेजीमेंट में शामिल होते ही मेरी मिलिट्री ट्रेनिंग शुरू हो गई। वहां रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं रहती थी। माचिस तक जलाने की इजाजत नहीं थी।

 

रोशनी से हम दुश्मन की नजर में आ सकते थे। एक महीने तक सिर्फ चावल में पानी डालकर खाते थे। बस एक ही जुनून था- देश आजाद कराना। रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट में दो हिस्से एक नर्सिंग और एक फाइटिंग थे। मैंने फाइटिंग में ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग के बाद युद्ध के लिए गई। ऊपर बमबारी हो रही थी।

दुश्मन की बंदूकें गरज रही थीं। पर हम खुश थे। देश के लिए शहीद होना हम 300 साथियों का सपना था। जल्द ही हमें लग गया कि आजाद हिंद फौज फिलहाल जीत नहीं सकती। नेता जी ने सभी लड़कियों को उनके घर भेजने के लिए कहा। वे हम सबसे मिलने आए और थोड़े भावुक हो गए।

मुझसे कहा- तुमी भया बोधा न (तुम्हें डर तो नहीं लग रहा?) मैंने जवाब दिया- आमी भय पाच्छी न (मैं नहीं डरती)। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। बस वही मुलाकात आखिरी थी। एक माह बाद ही खबर मिली कि उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here