द्वितीय विश्वयुद्ध की भूमिका तैयार हो रही थी। इस दौर में ओलंपिक खेलों में भाग लेने के लिए भारत की जो हॉकी टीम जर्मनी की राजधानी बर्लिन जा रही थी उसके कप्तान मोहम्मद जफर थे।टीम के नियमित कप्तान ध्यानचंद सिंह का नाम खिलाड़ियों की लिस्ट में नहीं था। ध्यानचंद को बर्मा जाना था जंग लड़ने। सेना कैंप में वर्दी में सिपाही ध्यानंचद को देखकर प्लाटून कमांडर ने कहा – ध्यान! तुम यहां क्या कर रहे हो? फिर प्लाटून इंचार्ज को बुलाया गया और सेना के दल से ध्यानचंद का नाम काटकर भारतीय हॉकी दल में शामिल कर लिया गया।

टीम में नया उत्साह आ गया। कप्तान मोहम्मद जफर ने यह कहते हुए कप्तानी से इस्तीफा दे दिया कि कप्तान आ गया है। फिर क्या था। जिस उम्मीद पर कप्तान वापस आया था उस पर खरे उतरते हुए वह बर्लिन की जमीन पर हॉकी स्टिक से इतिहास के पन्ने बढ़ाता चला गया।

फाइनल का रोमांचक मुकाबला जर्मनी से था। बारिश की वजह से तारीख एक दिन आगे बढ़ा दी गई थी। दर्शक दीर्घा में मौजूद जर्मनी के तानाशाह हिटलर के सामने भारतीय टीम ने 1 के मुकाबले 8 गोल दाग दिए। भारत मैच जीत गया। तानाशाह आधे मैच से उठकर स्टेडियम से बाहर चला गया। तारीख थी 15 अगस्त 1936। इधर, बर्मा में जंग लड़ने गए सैनिको की जिस लिस्ट से सिपाही ध्यानचंद का नाम काटा गया उनमें से कोई जिंदा नहीं बचा।

मेजर ध्यानचंद रिटायर होने तक सेना में सिपाही रहे लेकिन कहा जाता है कि वह जिस टीम के कप्तान थे या यूं कहें कि जिस देश के कप्तान थे उसमें किसी रियासत का एक नवाब भी शामिल था। जन्मदिन है आज दद्दा का। गुलाम भारत के निजी स्वाभिमान, क्षमता, साहस, सामर्थ्य और जुनून का परचम बुलंद करने वाले पहले खेल-नेता का। हॉकी के जादूगर का।
( राघवेंद्र शुक्ल के फेसबुक वॉल से )

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