पटना: भारत के ज़्यादातर बड़े शहरों में जब भी कोई पैदल घूमना चाहता है या साइकिल लेकर सड़क पर निकलना चाहता है तब उसे मायूस होकर या खीज कर कहना ही पड़ता है की सब जगह बाइक या कार वाले ही भरे हुए हैं. साइकिल के लिए तो जगह ही नहीं है.

अगर कोई बेचारा हिम्मत कर साईकिल लिए दिल्ली की सड़क पर निकल भी आए तो बगल से सांय सांय करती हुई गाड़ियां ऐसे निकलती हैं लगता है साईकिल उड़ ही जाएगी.

लेकिन दुनिया का  एक देश ऐसा भी है जहां इसके बिलकुल उलट होता है. अगर कोई कार या मोटरसाइकिल वाला सड़क पर निकल आए तो वह खीज कर कहता है की कार के लिए तो जगह ही नहीं है. क्योकि पूरी सड़क साइकिल चलाने वाले ही घेरे रहते हैं. यहां तक की प्रधानमंत्री भी साईकिल चला रहा होता है.

यह कहना गलत नहीं होगा की नीदरलैंड के एम्स्टर्डम में साइक्लिस्ट ही शासन करते हैं. और उनकी ज़रूरतें पूरी करने के लिए करने के लिए शहर ने खूब काम किए हैं. साइकिल एम्स्टर्डम में इतनी पॉपुलर है कि नीदरलैंड  के प्रधानमंत्री मार्क रुट्ट भी संसद साइकिल से ही जाते हैं.

एम्स्टर्डम शहर के रिंग रोड और  लेन साइकिल वालों के लिए विस्तृत नेटवर्क से लैस है. वह इतना सुरक्षित और आरामदायक है कि बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग लोग साइकिल का सबसे आसान साधन के रूप में उपयोग करते हैं. साइकिल चलाने का यह कल्चर केवल एम्स्टर्डम नहीं बल्कि  सभी डच शहरों में है.

डच लोग साइकिल चलाने को अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं और अक्सर मज़ाक में कहते हैं कि साइकिलें धरती पर समय की शुरुवात से ही हैं. लेकिन ऐसा है नहीं. 1950  और 60 के दशक में, कारों की संख्या एम्स्टर्डम और दूसरे शहरों में लगातार बढ़ रही थी और साइकिल चलने वालों को खतरा था कि ऐसा हुआ तो सड़कों पर कारों का ही कब्ज़ा होगा.

लेकिन साइकिलों को लेकर लोगों ने  लगातार सामजिक और न्यायिक सक्रियता दिखाई और यह ध्यान दिए के चाहे जितनी कारें बढ़ें साइकिलों के लिए जगह रहनी चाहिए. 70  के दशक में किये गए इन्ही प्रयासों से सरकारों को सड़कों की बनावट और पैदल चलने के लिए फुटपाथ बनाने पर ध्यान देना पड़ा. और आज नीदरलैंड का शहर एम्स्टर्डम दुनिया की साइकिल राजधानी बन गया है.

20 वीं शताब्दी की शुरुआत में, डच शहरों में साइकिलों की संख्या बहुत अधिक थी और साइकिल को पुरुषों और महिलाओं के लिए परिवहन का एक सम्मानजनक तरीका माना जाता था. लेकिन जब युद्ध के बाद के युग में डच अर्थव्यवस्था में तेजी आई, तो ज्यादा लोग कार खरीदने में सक्षम हो गए और  शहरी नीति निर्माताओं ने कार को भविष्य के यात्रा मोड के रूप में देखा.

कारों के लिए रास्ता बनाने के लिए पूरे एम्स्टर्डम के कई हिस्से नष्ट किये गए और बदले गए. साइकिल का उपयोग प्रति वर्ष 6% गिरता रहा और सामान्य विचार भी  यह था कि अंततः साइकिलें पूरी तरह से गायब हो जाएंगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

बढ़ते हुए ट्रैफिक का नुकसान साफ़ दिख रहा था. 1971 में सड़क दुर्घटनों में हुई मौतों की संख्या 3,300 पर पहुंच गई. उस वर्ष यातायात दुर्घटनाओं में 400 से ज्यादा बच्चे मारे गए थे.

इस चौंकाने वाले भारी नुकसान से लोगों में रोष पैदा हुआ और खूब विरोध प्रदर्शन हुए. इन सभी विरोद प्रदर्शनों में सबसे ऐतिहासिक और यादगार था  स्टॉप डी किंडर्मोर्ड (“बाल हत्या रोको”) था.

इन विरोध प्रदर्शनों में साइकिल का ही सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हुआ. युवा, बच्चे, और बुज़ुर्ग सभी मिलकर प्रदर्शन करते थे. प्रदर्शन के दौरान गीत गए जाते थे, घर की सभी काम सडकों पर आकर किये जाते थे. यहां तक कि लोगों ने अपने डाइनिंग टेबल भी सड़क पर लगाकर वहां डिनर करना शुरू कर दिया था.

‘स्टॉप डी किंडर्मोर्ड’ की बातें डच सरकार को सुननी पड़ीं और उसने उसने अपने मुख्यालय को एक दुकान में स्थापित किया, और सुरक्षित शहरी नियोजन के लिए विचार विकसित करने के लिए आगे बढ़े. जिसके परिणामस्वरूप अंततः वुनेरफ बनाई गई. वुनेराफ़ नै तरह की सड़क थी जिसपर स्पीड ब्रेकर और मोड़ हों और स्पीड लिमिट तय की गई ताकि गाड़ियां धीमी चलें.

यह बड़ी जीत थी लेकिन स्टॉप डी किंडरमोर्ड की स्थापना के दो साल बाद, कार्यकर्ताओं के एक और समूह ने प्रथम क्षेत्र में साइकिलों के लिए अधिक जगह मांगने के लिए फर्स्ट ‘अचल रियल डच साइकलिस्ट्स यूनियन’ की स्थापना की – जो सड़क के खतरनाक हिस्सों पर साइकिल सवारी का आयोजन, और  साईकिल चलने वालों से जुडी समस्याओं पर बात करने लगा.

1973  का तेल संकट  जब सऊदी अरब और अन्य अरब तेल निर्यातकों ने यम किपपुर युद्ध में इजरायल का समर्थन करने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जापान और नीदरलैंड पर प्रतिबंध लगाया – तेल की कीमत चौगुनी हो गई. एक टेलीविजन भाषण के दौरान, प्रधान मंत्री डेन उइल ने डच नागरिकों से एक नई जीवनशैली अपनाने और ऊर्जा बचाने के बारे में गंभीर होने का आग्रह किया. सरकार ने कार-मुक्त रविवार की एक श्रृंखला की घोषणा की: बेहद शांत सन्डे जब सभी साइकिल चलने लगे और लोगों ने जाना कि कारें आने से पहले उनका जीवन कैसा था.

धीरे-धीरे, डच राजनेता साइकिल चालन के कई फायदों से अवगत हो गए, और उनकी परिवहन नीतियां पुरानी हो गईं – उन्हें लगा शायद कार भविष्य के परिवहन के साधन नहीं थी. 1980 के दशक में, डच कस्बों और शहरों ने अपनी सड़कों को और अधिक साइकिल अनुकूल बनाने के उपायों पर काम करना शुरू किया.

अब साइकिल पथ चमकदार और खूब सारे  दिखाई दे रहे थे. यह एम्स्टर्डम के लिए  कुछ नया था. साइकिल चालक मार्गों का उपयोग करने के लिए अपने मार्ग बदल रहे थे क्योकि अब विकल्प कई हो गए थे.

इसके बाद, डेल्फ़्ट शहर ने रिंग रोड का एक संपूर्ण नेटवर्क बनाया और यह पता चला कि इससे लोगों को अपनी बाइक पर जाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था. एक-एक करके, अन्य शहरों का पालन किया.

आजकल नीदरलैंड में 22,000 मील के रिंग रोड  हैं. यूके के 2% की तुलना में,नीदरलैंड में साइकिलों से ही यात्राओं की एक चौथाई से अधिक की दूरी तय की जाती है – और यह एम्स्टर्डम में 38%.सभी प्रमुख डच शहरों ने “साइकिल सिविल सेवकों” को नामित किया है, जो नेटवर्क को बनाए रखने और सुधारने के लिए काम करते हैं. और बाइक की लोकप्रियता अभी भी बढ़ रही है.  इलेक्ट्रिक साइकिलों का भी जबरदस्त विकास हुआ  है.

Source: News18

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