‘सावन का महीना पवन करे शोर’,कभी ये गाना सावन आते ही लोगों की जुबान पर खुद-ब-खुद आ जाता था। आज वक्त ने ऐसी करवट ली है कि सावन तो आता है पर अपने रंग नहीं बिखेर पाता। जिस सावन के आते ही नववधु के पैर ससुराल से मायके की दहलीज तक पहुंचते थे। मां बेटी के घर आने का इंतजार गली-मुहल्ले की औरतों के साथ करती थीं। अब वो इंतजार तो नहीं पर हां सावन में बेटी के कॉल से मां को इसका एहसास तो हो जाता होगा।



सावन ने बदल लिया रंग

जब साजन से दूर सजनी कजरी तीज पर अपने उनके आने का इंतजार करती थी। सावन में साजन को देखकर उसकी आंखे शर्म से लाल हो जाती थी। तब कवियों की रचनाएं भी इस पर अंगड़ाई लेने लगती थी।

अब सावन तो आता है पर हरियाली कहीं खो जाती है। ना बाजारों में वो चमक रही, ना घर-आंगन में उसके आने का उत्साह। पहले दिनभर मंदिर, घर-बाहर सब जगह भोले बाबा के जय कारे से गुंजायमान हो जाते थे। अब तो भगवान को भी वक्त का पाबंद बना दिया गया।

अब ना साजन का इंतजार ना प्रेयसी की विरह वेदना
अब सावन आता है पर ना तो प्रेयसी की विरह वेदना नजर आती है, ना ही बागों में झूले दिखते हैं। सब आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो गए। पहले लोग साल के और दिन कहीं भी रहे, पर सावन में वतन जरूर लौटते थे। अब ऐसा नहीं ना देश ना परदेश, सब जगह सावन ने अपना रंग अंदाज बदल लिया है। कुछ रह गया है तो वो है सावन की बीती यादों का एहसास। देश-परदेश में रहने वाले कुछ लोगों ने बयां किया है सावन के अपने दर्द भरे एहसास…

हो गए गहरे रंग मेहंदी के, खो गई उसकी महक
सावन का फीकापन केवल परदेश में नहीं, देश में भी देखने को मिलने लगा है। कुछ ऐसा ही रांची की सुप्रिया ने कहा है। इनके अनुसार अब ना वो बारिश रही, ना ही वो रोमांच। बस इनके लिए बचा है तो उसका सिर्फ एहसास। इनका कहना है कि मेहंदी ने तो रंग गहरे कर लिए है पर वो सोनी-सोनी सी खुशबू कहीं खो सी गई है और तो और सावन के झूलों ने भी अब साजन को पुकारना बंद कर दिया है।

कहीं मेरे देश में ही छूट गया सावन
न्यू जर्सी में रहने वाली पल्लवी पाठक मिश्रा से जब पूछा कि परदेश में कैसी है सावन की महक तो उन्होंने कुछ यूं बयां किया हाले दिल। कहा कि शक्ति और भक्ति में तो कोई कमी नहीं है बस कमी है तो समय की। पहले मंदिर छोटे होते थे और भोले बाबा पर जल चढ़ाने की होड़ लगी होती थी,अब मंदिर बड़े हो गए है, लेकिन आज की बिजी लाइफ में समय की कमी ने मंदिरों में भीड़ कम कर दी है। उस पर हजार तरह की सिक्यूरिटी। उनका कहना है कि परदेश में सावन का रंग बहुत ही फीका हो गया है। भोले बाबा का महीना सावन, हरी चूड़ियों का महीना सावन, मेहंदी और श्रृंगार का महीना सावन कही मेरे देश में ही छूट गया है। रह गया है तो बस उसकी याद।

नॉनवेज और वेज हो गए सब दिन बराबर
लंदन में रहने वाली मधु चौरसिया अपने सावन के दिन याद करते हुए कहती है कि वहां भी लोगों को इंडियन सावन के बारे में इंटरनेट से पता चलता है, लेकिन अपने देश जैसा वहां कुछ नहीं होता है। ना वहां मेंहदी की महक आती है ना बाजारों में हरी चूड़ियों की खनक ही सुनाई देती है और ना ही सावन के झूलों को झूलती कोई गोरी नजर आती है। परदेश क्या देश में भी सावन ने करवट ले ली है। मधु ये भी कहती हैं कि पहले लोग सावन में नॉनवेज छोड़ देते थे। अब तो ऐसा कुछ नहीं होता।



सब खो गया आधुनिकता के रंग में

वैसे तो अनुराधा पांडे हैदराबाद में डीआरडीओ में काम करती है, लेकिन पति की वजह से देश की दहलीज के बाहर परदेश में जाना पड़ता है। उनका कहना है कि हांगकांग में ना तो सावन, ना उसकी महक है। बस उसकी याद जहन में है। उनका कहना है कि उन्होंने अपने देश में जो हरियाली देखी, वो अब नहीं देखने को मिलती है। वो उमंग और तरंग सब खत्म हो गया है। अब सावन बदल गया या कहे हर चीज की तरह सावन भी हाईटेक हो गया है। अब ना मेहंदी से आंगन महकता है, ना बारिश आते ही मोर नाचता है और ना ही बागों में झूले पड़ते हैं। अगर झूले दिखे भी तो आधुनिक ट्रेंड में। उनका मदमस्त, चितचोर सावन अब बस मन के कोने में दफन सा हो गया है।

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