दिल्ली का जंतर मंतर देश की राजधानी में प्रदर्शन करने वालों का अड्डा माना जाता है। माना जाता है कि यहां उठने वाली आवाज सीधे देश की संसद तक जाती है। लेकिन आज हम आपको बतायेंगें जंतर मंतर का इतिहास कैसे आप यह घुमकर ऐतिहासिक वेधशाला को अच्छे से जान सकते हैं जंतर मंतर का निर्माण 1724 में जयपुर के राजा जय सिंह द्वितीय ने दिल्ली में कराया था।

दिल्ली का जंतर मंतर एक खगोलीय वेधशाला है, जहां बड़े-बड़े उपकरणों की मदद से खगोलीय गणना होती थी। दिल्ली के जंतर मंतर को हम एक बेजोड़ और चकित कर देने वाला प्रयास भी कह सकते हैं। इसका निर्माण कराने वाले राजा जय सिंह खुद भी एक गणितज्ञ और खगोलविज्ञानी थे। उनकी इसी रुचि ने जंतर मंतर को साकार किया। जंतर मंतर में ऐसे कई उपकरण हैं जो खगोलीय ब्रह्मांड के रास्ते को ग्राफ के जरिए बता सकते हैं।

इतिहास
राजा जय सिंह द्वितीय की बहुत छोटी आयु से ही गणित विषय में अधिक रूचि थी। 11 वर्ष की आयु में पिताजी के मृत्यु के पश्चात उन्हें ही राजगद्दी संभालनी पड़ी जिसके कारण उनकी औपचारिक पढाई छूट गयी थी। गणित में रूचि होने के कारण 25 जनवरी, 1700 में राजगद्दी सँभालते हुए भी उन्होंने अपने अध्ययन को जारी रखा। इसी दौरान उन्होंने खगोल विज्ञानं और ज्योतिष का भी गहरा अध्यन किया। अपने कार्यालय में उन्होंने कई प्रकार की खगोल विज्ञान से सबंधित पुस्तके एवं यंत्र एकत्रित किये हुए थे।

राजा जय सिंह ने विचार हेतू कई प्रमुख खगोलशास्त्रियों को एक विशेष स्थान पर एकत्रित किया था। उनके इस महान कार्य में हिन्दू, इस्लामिक और यूरोपीय खगोलशास्त्रीयो ने अपना बराबर योगदान दिया था। राजा जय सिंह के शासन काल के दौरान उन्होंने एक दल निर्मित किया जो खगोलशास्त्र से सम्बंधित जानकारिया और तथ्यों की तलाश करता था। एक बार राजा ने उस दल को भारत से यूरोप भेजा था। ये दल न्यूटन, गालीलेओ, कोपरनिकस और केप्लेर के कार्यो और उनकी किताबे लाने में असमर्थ रहा परन्तु कुछ किताबे, दस्तावेज और यंत्र अपने साथ लाया था।

जंतर मंतर का निर्माण
दिल्ली के कनॉट प्लेस में स्थित जंतर मंतर स्थापत्य कला का अद्वितीय नमूना है जो दिल्ली के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। जंतर मंतर को वेधशाला कहा जाता है जिसमे 13 खगोलीय यंत्र मौजूद है। मोहम्मद शाह के शासनकाल में हिन्दू और मुस्लिम खगोलविदों में ग्रहों की स्थिति के बारे में बहस छिड़ गई थी। इसे खत्म करने के लिए सवोई जय सिंह ने जंतर-मंतर का निर्माण करावाया ग्रहों की गति नापने के लिए यहां विभिन्न प्रकार की यंत्र लगाए गए थे।

जय सिंह ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता थे व् उन्हें इसमें बेहद दिलचस्पी भी थी। जंतर मंतर के निर्माण कार्य को समाप्त होने में लगभग 6 साल का समय लगा था। जिसके परिणाम स्वरुप 1734 में यह पूरी तरह तैयार हो गया था। जंतर मंतर में बने यंत्रो को मुख्य तौर पर ग्रहो की चाल का पता करने के लिए स्थापित कराया गया था।

जंतर मंतर के नाम का अर्थ
इस खगोलीय वेधशाला का नाम जंतर मंतर रखा गया, जिसका अर्थ है- ‘गणना के उपकरण।’ जंतर मंतर की परिधि में विशाल सम्राट यंत्र लगा हुआ है। सम्राट यंत्र के दक्षिण में एक अन्य उपकरण है। जिसका नाम है जय प्रकाश। दिल्ली के जंतर मंतर में स्थित जय प्रकाश में दो कॉन्केव हेमिस्फीरिकल स्ट्रक्चर हैं। इनका इस्तेमाल सूर्य और खगोलीय पिंडों की स्थिति पता लगाने में होता है। जंतर मंतर का निर्माण ईटों से किया गया है। जिस पर चूना पत्थर से प्लास्टर किया गया है। आपको दिल्ली के जंतर मंतर पर निम्न उपकरण मिल जाएंगे

सम्राट यंत्र

जय प्रकाश

राम यंत्र

नियति चक्र

मिश्र यंत्र

ये सभी उपकरण अलग-अलग खगोलीय गणनाओं में इस्तेमाल होते हैं। आज इस ऐतिहासिक ढांचे के ईर्द-गिर्द कई नई बड़ी-बड़ी इमारतें बन चुकी हैं। दिल्ली का जंतर मंतर आज भी आधुनिक विद्वानों को हमारे ब्रह्मांड में घूम रहे ग्रहों, पिंडों की स्थिति बताता है।

वर्तमान स्थिति
देश में कई बड़ी बड़ी इमारतों के निर्माण के कारण आज के युग में इन यंत्रो के अध्यन के नतीजे ठीक नहीं पाये जाते है। दिल्ली सहित जय सिंह ने पुरे भारत वर्ष में कुल पांच वेधशालाओं का निर्माण करवाया था जिनमे – दिल्ली, बनारस, जयपुर, मथुरा और उज्जैन सम्मिलित है। जयपुर के जंतर मंतर के खगोलीय यंत्र बिलकुल सही अवस्था में कार्य करते है। सन 1850 में मथुरा की वेधशाला नष्ट हो गयी थी। जंतर मंतर दिल्ली में होने वाले जन आंदोलन / प्रदर्शनों / धरनों का मुख्य स्थान है।

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