आर्य व व्रात्य संस्कृति के मिलन के त्रिकोण के मध्य अवस्थित अररिया जिले को शिव आस्था का प्राचीन स्थल माना जाता रहा है।

प्राचीनता से तमाम अलगाव के बावजूद यहां शिव आराधना की परंपरा किसी न किसी रूप में मौजूद जरूर है। पुराने मंदिरों में शिलालेख व प्राचीन मूर्तियां इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं ही, यहां के सामाजिक अनुष्ठान व संस्कार भी आम जनजीवन में भगवान शिव व मैया पार्वती की प्रबल मौजूदगी साबित करते हैं।

जिले के प्रमुख शिवालय व उनका इतिहास
मदनपुर: अररिया प्रखंड के मदनपुर बाजार में मदनेश्वरनाथ महादेव विराजते हैं। इस मंदिर की खोज एक स्वप्न के माध्यम से हुई तथा उसके बाद पूर्णिया के नवाब सैफ खां के दीवान राजा नंद लाल ने सन 1740 के आपसास यहां मंदिर का निर्माण करवाया। बाद में भी कई मुस्लिम शासकों ने मंदिर के महंथ को प्रचुर संपदा दान में दी।

मंदिर के निकट शिवगंगा की सफाई के दौरान यहां कई प्राचीन मूर्तियां मिली, जिन्हें परिसर में सुरक्षित रखा गया है। ये मूर्तियां गुप्त कालीन बतायी जाती हैं।

सुंदरी मठ:  ओरल ट्रेडीशन के मुताबिक इस शिवलिंग की स्थापना पांडवों व उनकी मां कुंती ने अपने अज्ञातवास के दौरान की थी। इसकी खोज उन्नीसवीं सदी में खेत जोतने के दौरान हुई। बाबा सुंदरनाथ को फौजदारी अदालत माना जाता है। इनकी महत्ता एवं कृपा अगाध है। यह मंदिर बनैली राज के राजा बहादुर कृत्यांनद सिंह के राज में था और वे जब भी इस इलाके में आते थे तो शिवलिंग पर सवा मन दूध चढ़ाने के बाद ही शिकार पर निकलते थे।

प्राचीनता से तमाम अलगाव के बावजूद यहां शिव आराधना की परंपरा किसी न किसी रूप में मौजूद जरूर है। पुराने मंदिरों में शिलालेख व प्राचीन मूर्तियां इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं ही, यहां के सामाजिक अनुष्ठान व संस्कार भी आम जनजीवन में भगवान शिव व मैया पार्वती की प्रबल मौजूदगी साबित करते हैं।

इन दिनों सुंदरी मठ में नये मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। पूर्व मंत्री व मंदिर निर्माण कमेटी के अध्यक्ष विजय कुमार मंडल ने बताया कि खुदाई के दौरान तकरीबन दस फीट नीचे लाल बलुआ पत्थरके कई स्तंभ आदि मिले हैं, जिन्हें संभाल कर रखा गया है।

बसैटी: बसैटी शिव मंदिरका निर्माण पुरैनिया राज परिवार की अंतिम महारानी इंद्रावती ने करवाया था। मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा यज्ञ का आयोजन महारानी ने स्वयं अपनी देखरेख में 1797 में करवाया। इस मंदिर की स्थापत्य कला बंगाल व मिथिला की शैलियों का सुंदर मिश्रण है तथा प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख है जिसमें पुरैनिया राजपरिवार के राजाओं का विवरण अंकित है। इस राज का मुख्यालय रानीगंज प्रखंड के पहुंसरा गांव में था और तकरीबन पंद्रह हजार वर्ग किमी क्षेत्र में इस परिवार का शासन था। शिलालेख के मुताबिक इस राज की स्थापना महाराजा समर सिंह ने शाहजहां के शासन काल में की थी तथा उनके बाद राजा विश्वनाथ, राजा नर नारायण, महाराज रामचंद्र व महाराजा इंद्र जैसे प्रतापी राजाओं का शासन रहा।

भीम भी आए थे यहां


इन मंदिरों के अलावा कई प्राचीन परंपराएं भी इस क्षेत्र में शिव के महत्व को रेखांकित करती हैं। किरातार्जुनीयम पुस्तक के अनुसार हजारों साल पहले यहां किरातों का शासन था और वे इतने सबल थे कि शिव को भी उनका रूप धरने को विवश होना पड़ा था। पांडुपुत्र भीम अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान यहां आए थे और किरातों से सात बार युद्ध किया था।

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