झारखण्ड स्तिथ राजमहल की पहाड़ी श्रृंखलाओं पर जब आप सफ़र करेंगे तो साहेबगंज और करमटोला रेलवे स्टेशन के बीच पहाड़ के ऊपर एक किला मिलेगा जिसे लोग तेलियागढ़ी के नाम से पुकारते हैं.

दिखने में जर्जर सा यह किला प्राचीन बंगाल में प्रवेश करने के लिए किसी भी सेना के लिए एक चाभी थी. जिसने यह जीता वह बंगाल का रास्ता पकड़ लेता था. यही कारण है कि शेरशाह से लेकर मराठा सैनिकों तक ने इस प्रवेश द्वार को खोलने के लिए तलवारें भांजी थी. सिकंदर महान के दूत मेगस्थनीएज के अनुसार यह बौद्ध मठ था जहाँ भिक्षुक तपस्या करते.

अब यह किला जर्जर हो चुका है. भारतीय पुरात्वत विभाग ने इसे संरक्षण के लिए चुना है, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है.

1820 में Sir Charles D’ Oyly (1781-1845) ने तेलियागढ़ी की एक वाटर कलर पेंटिंग बनाई थी जो ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित है.

सर चार्ल्स ऑली के द्वारा बनाये गए चित्र और आज की तारीक में तेलियागढ़ी की कैमरे से ली गयी तस्वीर (साभार –अशोक कर्ण- पूर्व फोटोग्राफ़र हिंदुस्तान टाइम्स) को देखेने पर कोई खास अंतर नहीं दीखता. यह किला 1820 में इतना जर्जर था तो उसके कई सौ साल पहले यह काफी मजबूत रहा होगा.

बेगम गुलबदन की एक राचना के अनुसार हुमायूं को इसी किले के पास शेरशाह से पराजित होना पडा था.

Charles D’ Oyly का जन्म बंगाल प्रान्त के ढाका में हुआ था. उनके पिता सर जॉन हेडली मुर्शिदाबाद के नवाब बाबर अली के कोर्ट में काम करते थे. चार्ल्स को 1785 में आरंभिक शिक्षा के लिए इग्लैंड भेजा गया और 1808 में वे ढाका के कलक्टर बने. सन 1831 में वे पटना में कमर्शियल रेजिडेंट भी थे.

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