यदि आप सोच रहे हैं कि ये केवल प्रथाओं या पौराणिक ग्रंथों की वजह से होता है तो हम आपको याद दिलाना चाहेंगे कि दुनिया में मौजूद सभी धर्म चाहे वो हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिख हो या ईसाई हो सभी में शादी के बाद दुल्हन, दूल्हे के घर जाती है। लेकिन यहाँ भी वही सवाल पैदा हो रहा है कि हमेशा वधू या दुल्हन क्यों? कभी लड़के, लड़की के घर आकर क्यों नहीं रहते?

शादी संवेदनशील मामला

विवाह को हमारे समाज में होने वाले 16 संस्कारों में से सबसे महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि ये दो व्यक्तियों का नहीं दो आत्माओं का मिलन होता है। इसके बाद स्त्री और पुरुष सात जन्मों के लिए एक हो जाते हैं।

वैदिक तथ्य

शादी के बाद लड़कियाँ ही ससुराल क्यों जाती हैं? ये रिवाज, मान्यता या सोच कब और कैसे बनी? इस विषय पर गहराई से अध्ययन करने के बाद कुछ वैदिक तथ्य सामने आए हैं, जिनमें से एक शादी के बंधन से जुड़ा हुआ है।

कन्यादान की रस्म
हमारे इस ‘क्यों’ का जवाब हमें कन्यादान की रस्म के द्वारा मिलता है। वैदिक ज्ञान के अनुसार कन्यादान करते समय पिता केवल अपनी पुत्री को ही दान में नहीं देता है बल्कि..

मैंने अपना प्रत्येक धर्म निभाया है
कन्यादान के समय पिता अपनी सारी जिम्मेदारियों को खत्म करते हुए होने वाले पति को अपनी बेटी की जिम्मेदारी सौंपता है। वह कन्यादान करते समय कहता है कि…

मनु संहिता के अनुसार
मैंने अपनी बेटी को बड़ा किया, अपना प्रत्येक धर्म निभाया। इस कन्यादान के बाद से ये तुम्हारी अमानत है। मनु संहिता के अनुसार यह पति का धर्म है कि वह अपनी पत्नी की सभी जरूरतों का ध्यान रखें।

पति की जिम्मेदारी
इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ के मुताबिक, एक पत्नी शादी के बाद अपने पति के घर ही जाती है। इसके बाद पति की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वह अपनी पत्नी की सारी उम्र रक्षा करें और उसकी छोटी से छोटी ख़ुशी का खयाल रखें।

देवी का स्वरुप

पुराणों में स्त्री को देवी के तुल्य माना गया है, इसलिए स्त्री को लक्ष्मी, अन्नपूर्णा और शक्ति के नाम से भी बुलाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवी रूपी स्त्री का पति के साथ जाना शुभ होता है।



दुल्हन को छोड़ना पाप

यदि विवाह के बाद दूल्हा अपनी दुल्हन को अपने साथ ना लाए और उसके माता-पिता के पास ही छोड़ आए तो वेदों में इसे नाशकारी पाप के तुलनीय माना जाता है। इस पाप से बचने के लिए भी दुल्हन का अपने पति के घर आना बेहतर माना जाता है

अथर्ववेद के अनुसार
अथर्ववेद में महिलाओं की तुलना नदी से की गई है, जिसमें ये भी कहा गया कि स्त्री उस नदी के समान है जो वर के सागर जैसे घर में जाकर उसमें पवित्रता घोलती है, इसलिए उसे वर के घर भेजना अत्यंत जरूरी होता है।

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