अपनी भव्यता व विस्तृत क्षेत्रफल में फैलाव के कारण यह मंदिर भक्तों व पर्यटकों को भाने लगा है। वहीं वर्ष में एक बार भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम के कारण भी लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना।

 

काली मंदिर ट्रस्ट के सचिव सुनील सिंह गोपाल के अनुसार 1862 में बखोरापुर में भयंकर हैजा फैल गया था, जिसमें लगभग 5 सौ लोग मर गये थे। उसी समय गांव में एक साधु का प्रवेश हुआ था। उन्होंने मां काली के पिण्ड स्थापना करने की बात कही थी। साथ ही कहा था कि ऐसा करने से यह बीमारी रुक जायेगी। बताया जाता है कि गांव के बड़े-बुजुर्गो ने सलाह-मशवरा के बाद नीम के पेड़ के पीछे मां काली के नौ पिण्ड की स्थापना कर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। चंद दिनों बाद साधु अदृश्य हो गये। साथ ही हैजा गांव से धीरे-धीरे समाप्त हो गया। श्री गोपाल के अनुसार एशिया में यह मंदिर द्वितीय स्थान प्राप्त करने के लिए प्रयासरत है। यहां लगभग 105 फीट की भव्य मां काली की प्रतिमा निर्माणाधीन है। शारदीय नवरात्र पर यहां भक्तों का तांता लगा है।

 

नवरात्र में होती है विशेष पूजा अर्चना:

नवरात्र के मौके पर इस मंदिर को भव्य ढंग से सजाया जाता है और विशेष पूजा अर्चना तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। जहां बिहार समेत दूसरे प्रदेश से भी भक्तों के आने का तांता लगा रहता है।

 

कैसे पहुंचें :

दानापुर-मुगलसराय रेलखंड के आरा रेलवे स्टेशन से लगभग 12 किलोमीटर उत्तर बड़हरा प्रखंड के बखोरापुर में स्थित है यह प्रसिद्ध मंदिर है। यहां जाने के लिए रेलवे स्टेशन से तथा गांगी के पास से वाहन बराबर मिलते रहते हैं। जाने का मार्ग सुगम व सरल है। मंदिर के आसपास पूजा सामग्रियों की दुकानें और होटल समेत अन्य सुविधाएं हैं। जहां भक्तों के लिए हर संभव सहायता व सहयोग मिलता है। पटना की तरफ से जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए कोईलवर के पास सड़क जाती है।

 

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