जब कोई इंसान जन्म लेता है तो वह बहुत से शर्तों पर अपना जीवन जीता है। कई बार उसे सपने भूलने पड़ते हैं तो कई बार माँ-बाप के सपनों को अपना सपना बनाना पड़ता है। मनमुताबिक अपनी ज़िन्दगी जीना इतना भी आसान नहीं होता। लेकिन होते हैं कुछ लोग जो अपनी शर्तों पर जीते हैं और जीतते भी हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं बनारस वाला इश्क के लेखक प्रभात बांधुल्या के बारे में।

बिहार के औरंगाबाद जिले के प्रभात अपने इश्क के जरिये पूरे भारत में छा रहे हैं। इश्क़ माने बात कर रहा हूँ इनके उपन्यास “बनारस वाला इश्क” की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से विधि स्नातक प्रभात काशी की प्रेम कहानी को कागज पर उतार लाये हैं। गंगा की धारा, घाट और महादेव के जयजयकार के बीच इश्क़ का तड़का परोसा गया है “बनारस वाला इश्क” में। वर्तमान में प्रभात मायानगरी मुम्बई में टीवी सीरियल के लिए लिख रहे हैं।

प्रभात की असल कहानी दरअसल शुरू होती है वकालत की पढ़ाई के दौरान। इस दौरान उन्होंने छात्र राजनीति में भी काफ़ी दिलचस्पी ली। पिताजी का सपना था कि बेटा वकील बने लेकिन बेटे का कुछ अलग ही जुनून था। वकालत की पढ़ाई से लेखक और पटकथा लेखक बनने का कारण ज़रूर उस चीज़ के पीछे की दीवानगी ही हो सकती थी।

बनारस किस्सों का शहर है और एक जीवनशैली है। अगर बनारस को हम बनारस की तरह जान रहे हैं तो इसमें प्रभात जैसे लेखकों का सबसे बड़ा योगदान है। इससे पहले सत्या व्यास की लिखी बनारस टॉकीज़ को भी हिंदी के पाठकों ने काफ़ी पसंद कर उसे बेस्टसेलर की सूची में शामिल कराया।

बनारस वाला इश्क़ दरअसल कहानी है बीएचयू कैंपस की राजनीति का। यहीं पर उभरता है एक ऐसा प्रेम जिसमें दो विपरीत ध्रुवों के नायक-नायिका आपस में टकराते हैं। इनके बीच मुलाकात, प्यार, टकराव, बिखराव सब होता है और इन्हीं सबकी एक मुकम्मल कहानी है बनारस वाला इश्क।

प्रभात ने इस किताब में अपने बिहारी टोन को नहीं भूला यही इस किताब की सबसे बड़ी खासियत है। वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रभात ग्लैमर के सबसे बड़े शहर में अब सफ़लता की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं। अब वो हिंदी सीरियल्स के लिये पटकथा लेखन का काम करते हैं। इस तरह से बिहार के एक युवा ने लोगों को एक प्रेरणा दी कि अगर आप किसी चीज़ का सपना देखते हैं और वह आपका जुनून हो जाता है तो उसे पूरा करना बहुत मुश्किल नहीं रह जाता और आप उसे एक दिन पूरा कर ही लेते हैं।

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