नालंदा विश्वविद्यालय

शिक्षा के मामले में भारत का इतिहास हमेशा अद्भुत और उच्च रहा है, और उसकी खास वजह है- नालंदा विश्वविद्यालय। आप सब ने नालंदा विश्वविद्यालय का नाम तो सुना ही होगा, जिसकी स्थापना करीब 2500 साल पहले बौद्ध धर्म के लोगों ने की थी। यह विश्वविद्यालय न केवल शिक्षा, बल्कि कला के साथ-साथ और तमाम पहलुओं का एकमात्र केन्द्र था।

बिहार में बसा नालंदा विश्वविद्यालय का काल 6वीं से 13वीं शताब्दी. यानि 700 साल से भी पुराना माना जाता है। ‘नालंदा’ शब्द संस्कृत के तीन शब्दों के संधि-विच्छेद से बना है जिसका अर्थ है ‘ज्ञान रूपी उपहार पर कोई प्रतिबन्ध न रखना और इसी विश्वविद्यालय की वजह से हमारे भारतीय विद्वान नालंदा विश्वविद्यालय में 700  वर्ष पूर्व अभ्यास किया करते थे।

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जब नालंदा विश्वविद्यालय अपने बुलंदियों पर था, तब भिन्न-भिन्न देशों के लगभग 10,000 से भी अधिक विद्यार्थी यहां रहकर अध्ययन किया करते थे। यही नहीं, यहां करीब 1500 से भी अधिक शिक्षकों की संख्या थी। यहाँ पढने वाले छात्र न केवल बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण करते थे, बल्कि उनकी शिक्षा में अन्य संस्कृतियों और धार्मिक मान्यताओं का समावेश था।

शायद आपको यह जानकार हैरानी होगी कि उस समय नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा पूर्ण रूप से नि:शुल्क थी। इस बात में कतई कोई संदेह नहीं है कि नालंदा विश्वविद्यालय हमारे भारत देश के उन भारतीय प्रतीकों में से एक है, जिन पर न केवल सिर्फ बिहारियों को और भारतीयों को गर्व है, बल्कि हमारे आने वाली पीढ़ियां भी सदियों तक निःसंदेह गौरवान्वित महसूस करेंगी।

लेकिन क्या आपको भी लगता है कि नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में आपने ये सब कुछ पहले ही सुन रखा है या पहले से ही यह सारी बातें जानतें हैं?

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तो आइये आज हम आपको नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ ऐसे अद्भुत और अनोखे तथ्यों के बारे में बताएंगे, जिसे शायद ही आप जानते हों:-

आध्यात्मिक और बौद्धिक पीढ़ी की उत्पत्ति करना

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नालंदा विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी पीढ़ियों का निर्माण करना था, जो न केवल बौद्धिक बल्कि आध्यात्मिक हों और समाज के विकास और संगठन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।

बौद्ध संन्यासियों का अध्ययन केंद्र

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नालंदा की स्थापना बौद्ध संन्यासियों के द्वारा की गई थी, जिसका मूल उद्देश्य एक ऐसे स्थान की स्थापना करना था, जो ध्यान और आध्यात्म के लिए उपयुक्त हो। ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्ध ने कई बार नालंदा की यात्रा की थी और उन्होंने यहां कुछ दिन भी गुज़ारे थे। यह संस्थान इसलिए भी एक प्रसिद्ध था क्यूंकि यहाँ कई सन्यासियों को शिक्षा और आध्यात्म का एक अनुकूल वातावरण प्रदान किया जाता था।

नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना, गुप्त राजवंश ने की थी

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ऐतिहासिक पन्नों के मुताबिक इस विश्व-प्रसिद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त ने की थी। नालंदा में मिली कुछ मुद्राएं भी इस बात की पुष्टिकरण करती हैं।

 नालंदा विश्वविद्यालय विशालकाय पुस्तकालय, 6 महीने तक जलता रहा

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नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय ‘धर्म गूंज’, जिसका अर्थ है ‘सत्य का पर्वत’, विश्व का सबसे बड़ा पुस्तकालय था। यह पुरे विश्व भर में भारतीय ज्ञान का खज़ाना था और अब तक का सबसे प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध केन्द्रस्थल भी था। ऐसा कहा जाता है कि इस पुस्तकालय में लाखों की संख्या में पुस्तकें उपलब्ध थे।

इसके विशाल आकर का अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि इसमें जब आग लगाईं गयी थी तो सिर्फ लगी आग को बुझाने में छह महीने से अधिक का समय लग गया था। इस महान और विशालकाय विश्वविद्यालय को इस्लामिक आक्रमणकारियों ने आग के हवाले कर दिया था।

नालंदा विश्वविद्यालय का खंडहर

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नालंदा विश्वविद्यालय की कई इमारत या संस्थान तो कब की नष्ट हो चुकी है लेकिन विध्वंस हो चुकी प्राचीन सरचनाएं और बनावटें अब भी मौजूद हैं। यहाँ खुदाई के दौरान मिले अवशेष 15,00,00 वर्ग फुट मीटर के एक क्षेत्र में विस्तृत रूप से मिले हैं। ऐसा माना जाता है कि अभी भी नालंदा विश्वविद्यालय का 90 प्रतिशत क्षेत्र ऐसा है, जिसकी खुदाई अभी भी नहीं की गई है।

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