संघ लोक सेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा 2017 का फाइनल रिजल्ट शुक्रवार को जारी कर दिया, इस बार हैदराबाद के अनुदीप दुरिशेट्टी ने टॉप किया है तो वहीं दूसरे नंबर पर अनु कुमारी और तीसरे पर सचिन गुप्ता हैं। चौथा स्थान बिहार के पटना जिले के अतुल प्रकाश को मिला है।

बिहार की बात करें तो इस बार भी बड़ी संख्या में बिहार के अभ्यर्थियों ने अच्छी रैंक के साथ सफलता हासिल की है। पटना के अतुल प्रकाश के साथ ही सहरसा जिले के चैनपुर के सागर कुमार झा को 13वां और पटना की अभिलाषा अभिनव को 18वां व रविकेश त्रिपाठी को 334वां स्थान मिला है।

वहीं, कहलगांव की ज्योति को 53वीं, भागलपुर के मोतिउर्रहमान को 154वीं, मुंगेर के अविनाश को 139वीं और बेगूसराय के योगेश गौतम को 172वीं रैंक मिली है। बता दें कि टॉप 25 में आठ लड़कियां शामिल हैं। टॉप 10 में दिव्यांग सौम्या शर्मा भी शामिल हैं, जिन्होंने नौवीं रैंक प्राप्त की हैं।

अतुल प्रकाश ने दूसरे प्रयास में यह चौथी रैंक हासिल की है। इससे पहले उन्हें 500वीं रैंक मिली थी और वह भारतीय रेल सेवा के लिए चुने गये थे। उनके पिता अशोक राय हाजीपुर रेल मंडल में चीफ इंजीनियर के पद पर कार्यरत है। अतुल आइआइटी, दिल्ली से पासआउट हैं। वे मूल रूप में बक्सर जिले के चौसा के रहने वाले हैं। वर्तमान में उनका परिवार पटना के गोला रोड में रहता है।

13वीं रैंक प्राप्त सागर कुमार झा ने डीपीएस रांची से स्कूली शिक्षा और आईआईटी, बीएचयू से बीटेक की डिग्री हासिल की है। इससे पहले उन्होंने असिस्टेंट कमांडेंट की परीक्षा में पूरे देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया था

18वीं रैंक प्राप्त अभिलाषा के पिता भोलानाथ सरकार रिटायर्ड अाईपीएस अधिकारी हैं। डॉन बॉस्को पटना से पढ़ाई करनेवाली अभिलाषा ने दूसरे प्रयास यह सफलता हासिल की हैं। एसी पाटील कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, नवी मुंबई से बीटेक अभिलाषा ने पहले प्रयास में राजस्व सेवा का कैडर हासिल किया। फिलहाल वह आईटी कमिश्नर के रूप में नागपुर में अंडर ट्रेनिंग हैं।

334वीं रैंक वाले रविकेश त्रिपाठी पटना के सेंट माइकल हाईस्कूल से पढ़ाई की है। उनके पिता अजय त्रिपाठी पटना जंक्शन पर मुख्य आरक्षण अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। इसके अलावा बेगूसराय के योगेश गौतम ने 172वां, गया के अमृतेश कुमार ने 363वां, मोतिहारी के अविनाश चंद्र शाडिल्य ने 391वां, मधुबनी के रतन कुमार झा ने 408 वां और संपचक के बीडीओ के बेटे नीतीश ने 671वां स्थान पाया है।

बिहार के अन्य सफल अभ्यर्थी
मोतिउर्रहमान भागलपुर 154
योगेश गौतम बेगूसराय 172
अमृतेश कुमार गया 363
अविनाथ चंद्र शाडिल्य मोतिहारी 391
रतन कुमार झा मधुबनी 408
नीतीश कुमार संपतचक 671
समीर किशन जन्दाहा 748

संघ लोक सेवा आयोग, सबसे कठिन परीक्षा
भारत में संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली सिविल सर्विस परीक्षा को सबसे अध‍िक मुश्क‍िल माना जाता है। लेकिन आइएएस ये टॉप रैंकर्स कैसे बनते हैं, इसका फिक्स फॉर्मूला तो अब तक किसी को नहीं मिला, लेकिन माना जाता है कि कुछ राज्य ऐसे हैं जिन्होंने इस फॉर्मूले को क्रैक कर लिया है। सोशल मीडिया के अनुसार सबसे ज्यादा आईएएस बिहार से आते हैं। हालांकि अब बिहार इन टॉपर्स को पैदा करने में दूसरे नंबर पर है।

बिहार है पिछड़ा राज्य, मेधा का लोहा मानती है दुनिया
कहने को बिहार पिछड़े राज्यों में आता है लेकिन इसकी मेधा का लोहा पूरी दुनिया ने माना है। शून्य का अाविष्कार करने वाले आर्यभट्ट हों या अर्थशास्त्र के प्रणेता चाणक्य, दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा बुद्ध हों या शिक्षा का संदेश देने वाला नालंदा विश्वविद्यालय, इनसब पर बिहारियों को नाज है।

शिक्षा का प्रतिशत कम, मूलभूत सुविधाओं की कमी
आज भी जिस राज्य में शिक्षा का प्रतिशत मात्र 52.47% हो, जहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव हो, जहां 23.97 लाख युवा बेरोजगार हों, फिर भी आज बिहारियों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि हम किसी से कम नहीं। देश-विदेश में बिहारी अपना परचम लहराते रहे हैं, देश के अधिकतम बड़े पदों की शोभा आज भी बिहारी बढ़ा रहे हैं, आइबी प्रमुख हों या सीबीआइ प्रमुख, बिहारी राज कायम है।

राजनीति में भी पीछे नहीं
बिहार के राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो यहां से काफी संख्या में राजनीति के चमकते चेहरे केंद्र और राज्य सरकार का हिस्सा हैं और बिहार ही राजनीति और देश का मिजाज तय करता रहा है। तो वहीं बिहारी भारतीय प्रशासिक सेवा की रीढ़ की हड्डी कहे जाते हैं, दूसरे शब्दों में बिहार पिछड़ेपन और अभावग्रस्त राज्य होने के साथ आइएएस की फैक्ट्री कहा जाता है, जो इस बार भी यूपीएससी के रिजल्ट से साबित हो गया है।

5,500 आइएएस में से 450 बिहारी
देश में कुल 5,500 आइएएस में से 450 बिहारी हैं, साथ ही दस ब्यूरोक्रेट्स एेसे हैं जो पूर्व और पश्चिमी क्षेत्र को संभाले हुए हैं। आइएएस ही नहीं, आइपीएस, आइएफएस भी ज्यादातर बिहार से ही आते हैं। पिछले दस साल की बात करें तो सात सौ में से पच्चीस प्रतिशत बिहार के अभ्यर्थियों ने आइएएस और आइपीएस की परीक्षा में सफलता पाई है।

क्या बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी..
पिछड़ा राज्य, बीमारू राज्य, बिहारी का टैग…ये सब बातें ठीक है, लेकिन आखिर क्या बात है कि बिहार आज भी आइआइटी की परीक्षा हो, यूपीएससी की परीक्षा हो या कोई भी प्रतियोगी परीक्षा अपना बेहतर प्रदर्शन करता रहा है? यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी….

बिहारी छात्रों की मेधा का लोहा आज पूरी दुनिया मानती है। आज बिहार की राजधानी पटना शिक्षा का हब बन चुका है। लेकिन राजनीति, जातिप्रथा, सरकारी उपेक्षा की वजह से यहां से छात्र बेहतर शिक्षा के लिए अन्य राज्य के बड़े शहरों में पलायन कर जाते हैं।
हालांकि यहां भी संभावनाओं की कमी नहीं है, लेकिन छात्र और अभिभावक बेहतर भविष्य की तलाश में अन्य राज्यों में भटकते हैं, जिससे हर साल राज्य को घाटा उठाना पड़ता है। इसकी वजह है कि बिहार में छात्र केवल नौकरी को ही तरजीह देते हैं और उसके लिए ही मेहनत करते हैं, यही वजह है कि इंजीनियर बनने आइएएस बनने या अन्य बेहतर नौकरी की ही इच्छा सबको होती है।
बिहार में उद्योग की कमी है जिसकी वजह से बेरोजगारी की स्थिति है। बिहार का युवा सरकारी नौकरी ही चाहता है और इसी वजह से हर साल करीब 40,000 छात्र विभिन्न संस्थाओं में पढ़ने के लिए राज्य से बाहर चले जाते हैं और राज्य को राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है।

बिहार का रिक्शावाला भी देखता है बेटे को आइएएस बनाने का सपना
अगर हम अन्य राज्यों की तुलना करें तो बिहार में एक अभिभावक अपने पैसे इधर-उधर खर्च करने में कतराता है, एक किसान भी चाहता है कि उसका बेटा या बेटी पढ़ लिखकर आइएएस, आइपीएस या आइआइटियन बने। मां-बाप अपना पेट काटकर भी बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं।
ये एक सबसे बड़ी वजह है कि बिहारी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने को तैयार रहते हैं और बच्चे भी जी-जान लगाकर उनकी हसरत को पूरा करते हैं। इसीलिए एक पान वाले का बेटा-बेटी, किसान और रिक्शाचालक का बच्चा, मध्यवर्ग से आने वाला छात्र भी आज आइआइटी, आइएएस की परीक्षा में सफल हो रहा है।

बिहारियों ने कायम रखा है दबदबा
एक आंकड़े के अनुसार देश भर के कुल 4925 आईएएस अधिकारियों में 462 अकेले बिहार से हैं। यानी, 9.38 प्रतिशत टॉप ब्यूरोक्रेट्स बिहारी हैं। 2007 से 2016 के बीच देश भर से चुने गए कुल 1664 आईएएस अधिकारियों में से बिहार से 125 (7.51 प्रतिशत) शामिल हुए।
हालांकि यह बढ़ोतरी अभी बिहार से कुल आइएएस अधिकारियों की संख्या में कम है। बिहार से सबसे ज्यादा आईएएस अधिकारी 1987 से 1996 के बीच चुने गए। इस दौरान यूपीएससी के जरिए कुल 982 आईएएस अधिकारियों का चयन हुआ, जिसमें अकेले बिहार से 159 अधिकारी शामिल थे। उस समय बिहार से आईएएस बनने की दर 16.19 फीसदी रही।

उत्तरप्रदेश है टॉप पर
आपको बता दें कि सबसे ज्यादा आईएएस यूपी ने दिए हैं। 2016 तक इसकी संख्या 731 थी, 2011 से 2015 के बीच यूपी ने 118 आईएएस दिए। वहीं बिहार इस मामले में काफी पीछे रह गया। ब‍िहार से सिर्फ 68 आईएएस निकले, इस दौरान 97 आईएएस के साथ दूसरे नंबर पर राजस्थान और 90 आईएएस के साथ तमिलनाडु रहा। इसके बाद बिहार का नंबर आता है, इनके अलावा आंध्र प्रदेश से भी काफी आइएएस आते हैं।

यूपीएससी में बिहार का प्रदर्शन

आइएएस की संख्या में टॉप रहे ये राज्य

बिहार में अगर उच्च शिक्षा का बेहतर माहौल मिले तो वही छात्र अपने ही राज्य में रहकर और बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। पटना में चल रहे कोचिंग क्लासेज में भीड़ और राज्य सरकार की मुहिम अब छात्रों का पलायन रोकने में जरूर कारगर होगी और आने वाले वर्षों में बिहार का दबदबा कायम ही रहेगा।

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