आपने जरूर पढ़ा या सुना होगा की विदेशों में गर्मियों में मड प्ले का आयोजन किया जाता है, लेकिन बता दें तो ये हमारे बिहार के मिथिलांचल की संस्कृति में भी है। मिथिला की संस्कृति का अहम् हिस्सा है जुड़ शीतल का पर्व। ये अकेला ऐसा पर्व है जिसमें बासी भोजन खाने की परंपरा है। 14 अप्रैल को इस अवसर पर कई घरों में चूल्हा नहीं जलाया गया। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में इस परंपरा को पूरी संजीदगी के साथ मनाया जाता है।

बासी खाने के पीछे पूर्वजों का वैज्ञानिक तर्क भी बताया जाता है। उनके मुताबिक चंद्रमा और सूर्य की चाल आज के नक्षत्र और राशि में इस तरह हो जाती है कि खाद्य पदार्थों के खराब होने के लिए कारक कीटाणु सक्रिय नहीं रहते।
इसके अलावा इसी दिन से सौर वर्ष का भी शुभारंभ हो जाएगा। सौर मास के हिसाब से वैशाख की शुरुआत हो जाएगी। जूड़ शीतल के अवसर पर लोगों ने पौधों में पानी देकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया।
सुबह से ही घरों में बड़े-बुजुर्ग अन्य सदस्यों के माथे पर जल देकर जुड़ाएल रहु का आशीर्वाद देते रहे।
मान्यताओंके अनुसार चैत मास में शादी-ब्याह जैसे मांगलिक कार्य नहीं होते। जुड़ शीतल मेष संक्रांति को मनाया जाता है। यानि की अगले दिन से वैशाख माह शुरू हो जाता है। सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ ही चैत मास संपन्न हो गया।
 

सत्तू और बेसन के व्यंजनों के साथ मिथिला के लोग जुड़ शीतल मानते है । जो ,बिहार में सत्तूआइन ,बंगाल में नया साल ,पंजाब में वैशाखी ,असम में शायद बिहू और केरल में विशु कहलाता है। सम्भवत एक ऐसा पर्व जो देश के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग नाम से मनाया जाता है।

नाम चाहे जो हो वजह एक ,रबी की फसल काटे जाने का उत्साह। भारत एक कृषिप्रधान देश है इसलिए सभी पर्व भी उस समय होने वाले फसलों पर आधारित होते हैं। स्कूल के समय कौन सी फसल किस समय होती है इसे याद करना हम शहर में रहने वालों बच्चों के लिए बेहद कठिन होता था।

लेकिन बाद में ये बात समझ में आ गई कि 13जनवरी को दही चूड़ा खाने की परंपरा इसलिए है कि उस समय नए धान की उपज होती है इसी प्रकार 14 अप्रैल को गेहूँ और दलहन के पैदावार का समय है तो हमारे पूर्वजो ने इस समय बेसन ,सत्तू और दलपुड़ी खाने की प्रथा बनाई।

इतने स्पष्ट करने पर भी हम रटने वाली विद्या को मानते हुए रबी और खरीफ को काटे जाने वाले समय को रटते जा रहे है तो किसी का क्या दोष ? एक बात और भले ही आज लिट्टी चोखा के कारण सत्तू को सब जानने लगे हैं लेकिन सत्तू आज से 25 -30 साल पहले से ही बिहार से बाहर जाने वाले हर विद्यार्थी के बैग में एक अहम् भूमिका निभाता आ रहा है ।”

बिहारी हॉर्लिक्स” के नाम से प्रसिद्ध सत्तू, दिल्ली में पढ़ने वाले किसी बिहारी का साथ ठीक उसी प्रकार निभाता था जैसे बैंगलोर और मुम्बई में पढ़ने बिहार के बेटे-बेटियों का। इस सत्तू नाम की छोटी सी चीज़ को देखकर दक्षिण के दूसरे प्रांत के लोग भी उसे चखने के लालच से खुद को रोक नहीं पाते। क्या ऐसा नहीं लगता कि इस सत्तू ने उत्तर दक्षिण या देश विदेश की सीमा लांघ डाली !

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