dashrath manjhi

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यदि किसी को बिहार के लोगो को या एक बिहारी को जानना है तो वैसे तो कई वीर पुरुष पैदा किया है बिहार की पावन धरती ने लेकिन “माउंटेन मैन” दशरथ मांझी से परिचित होना भी बहुत जरूरी है।

आज के मॉडर्न युग में जब लोगो से सफलता की परिभाषा पूछा जाये तो मेरे ख्याल से एक ही जबाब होगा। कि आपको अंग्रेजी या हिंदी आना चाहिए। आप के पास कुछ पैसा-रुपया होना चाहिए। लेकिन ये बात शत प्रतिशत सही नहीं हो सकती हैं। इसी अभिप्राय को साबित करती ये कहानी एक ऐसी भोजपुरिया की है जिसे ना हिंदी की जरूरत पड़ी न इंग्लिश की और ही न रुपया और पैसो की लेकिन ये व्यक्ति हमारे समाज के लिए हमेशा प्रेरणा बना रहेगा।

“माउंटेन मैन” के नाम से मशहूर दशरथ मांझी का जन्म 1934 ई. में बिहार प्रान्त के गया के नजदीक गहलौर गांव में हुआ था। बचपन में ही मांझी की शादी पास के गांव की फ्लगुनिया से हो गया। शादी के कुछ दिनों बाद ही मांझी पैसा कमाने के लिए घर से भाग कर धनबाद चले गए लेकिन वहां लगभग 7 साल रहने के बाद मांझी जब आपने गांव पहुचे तो कुछ भी नहीं बदला था। एक मेले में घूमते हुए मांझी की नजर एक युवती पर पड़ी जिसे देख मांझी को प्यार हो गया। मांझी को जब पता चला की वो उनकी पत्नी फ्लगुनिया ही है जो उनके धनबाद जाने के बाद अपने मायके चली गयी थी घर वालो से बात कर मांझी फ्लगुनिया का गवना करा कर अपने घर दूबारा लाये। जहाँ उन्हें एक लड़की और एक लड़का हुआ, कुछ दिनों बाद फ्लगुनिया की तवियत अचानक खराब हो जाती है।

गांव और शहर के बीच 360 फिट लंबा पहाड़ था जिसकी वजह से रास्ते के द्वारा गांव और शहर की दुरी बहुत दूर थी और उस समय में गाड़ियों की इतनी सुविधा भी नहीं थी। जिस की वजह से पत्नी शहर के अस्पताल जाने से पहले ही मर गयी। ये हादसा मांझी को झकझोर कर रख दिया फ्लगुनिया के प्यार में डूबे हुए मांझी जैसे पागल सा हो गए। और प्रण किया कि जब तक पहाड़ को काट कर रास्ता नहीं बना देते तब तक चैन की साँस नहीं लेंगे। केवल छैनी और हथौड़ा से 360 फिट पहाड़ काटना कोई आसान काम नहीं था। गांव वाले मांझी को पागल तक कहने लगे लेकिन वास्तव में मनुष्य को अपने समाज के लिए कुछ करना है तो पागल बनना ही पड़ता है। मांझी भी कहा मानने वाले थे उनकी माँ का बचपन में कहा हुआ एक वक्तव्य हमेशा उनके जहन में रहता था-
“बारह साल में तो घूरे के भी दिन फिर जाते है”

बस यही मंत्र मांझी के लिए जैसे वरदान सा था जो लगातार उन्हें 22 साल तक 1960 से लेकर 1982 तक पहाड़ को काटने की शक्ति देता रहा। और एक ऐसा दिन भी आया जब मांझी ने आपने संकल्प को पूरा करते हुए 360 फिट लंबे, 30 फिट चौड़े और 25 फिट ऊँचे पहाड़ का सीना चिर कर रास्ता बनाया। मांझी को शायद ये पता नही था कि उन्होंने ऐसा काम कर दिया है कि जो आने वाले कई सालों तक एक प्यार करने वालो के लिए उदाहरण बना रहेगा। ताजमहल तो केवल नाम के लिए पर्याय है असली प्यार का उदाहरण तो मांझी का ये काम है जिसने गांव से 52 km दूर पड़ने वाले रास्ते को पहाड़ काट कर 15 km कर दिया। और खुद इसके लिए बिहार के मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार को आना पड़ा तब नितीश जी ने उस रोड का नाम भी दशरथ मांझी के नाम पर ही रख दिया।

देश के इतिहास में कई महापुरुष पैदा हुए लेकिन शायद ही कोई दशरथ मांझी हुआ होगा जो बिहारी अस्मिता की पहचान है। उन सच्चे प्यार करने वालो की पहचान है।ये पहली बार हुआ जब किसी ने अपने प्यार के लिए ऐसा काम किया हो। मांझी आज बिहारी अस्मिता के पुरोधा है। आज के समय में जब लोगों के नजर में बिहार से जुड़े लोग और बिहारी से नफरत है। दशरथ मांझी बिहार के उन लोगों की पहचान है की एक बिहारी कभी किसी पर बोझ नहीं होता है, बिहारी हमेशा अपनी मेहनत और ईमानदारी के दम पर अपना जीवन-यापन करता है। ह ये अलग बात है कि आपने यहाँ रोजगार ना होने की वजह से बिहारियों को दूसरे राज्य में जाना पड़ता है। इसी बात के ध्यान में रख के भारत सरकार ने 2006 में मांझी के भारत के चौथे सबसे बड़े पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया। लेकिन दुर्भाग्य से 17 अगस्त 2017 को माउंटेन मैंन के नाम से मशहुर दशरथ मांझी का देहांत हो गया।

बिहार का ये धरोहर आज हमारे बीच नही है लेकिन एक बिहारी होने के नाते पूरे बिहार की पहचान है।

शानदार! जबरदस्त!! जिंदाबाद!!!

जय मांझी! जय बिहार!! जय भारत!!!

आशुतोष धनराज सिंह
सिवान(बिहार)

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