माँ शारदा सिन्हा जी के कई गीत बहुत करुण होते हैं।चाहे विदाई हो, विरह हो, गौरि-सीता की वेदना हो या जन सामान्य के उपर उन्हे सुन कर मन विचलित सा हो जाता है।
“कौन सी नगरीया है चार फुट की देहिया है
बैलन से सस्ता बिक गए हम हो बाबूजी…
ऐसा दिखाया दुख सपना हुआ रे सुख बेटी नाही जनमी समानमा हो बाबूजी…
रुपीया गिनाय लिये पगहा धराय दिहे बेटी के तु जनवर बना दिये हो बाबूजी…
ढर ढर ढरकत है आँसु मोरा बाबूजी…
कौन सी नगरीया है चार फुट की देहिया है
बैलन से सस्ता बिक गए हम हो बाबूजी…”
माँ शारदा सिन्हा जी का गाया ये गीत जब भी
सुनता हुँ मार्मिक हो जाता हूँ।
सोचने लगता हुँ, क्या सच मे नारी जीवन ऐसा है?
Kundan Roy Painting
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:”
जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवताओं का निवास होता है।
भारत मे आदी काल से नारियाँ पूजित हैं। कही माँ दुर्गा तो कही माँ लक्ष्मी।
कहते हैं देवता हर जगह अपने अंश रूप मे व्यापी रहे इसलिये उन्होने ” माँ “की रचना की और उन्हे सृजन का अधिकार दिया।
पर वात्सल्य की भुखी इस ममता की मुर्ति को धीरे धीरे अपने ही रिश्तो ने छला और जहाँ काली माँ और सरस्वती माँ जैसी देवी सिर्फ मन्दिर में पूजित है वहीं साधारण नारियाँ आज भी माँ सीता की तरह अग्नि परीक्षा देती जा रही हैं।
सरकार कई तरह के कदम उठा रही है और सुधार भी हुआ नहीं तो कितनी नारियाँ आज तक सती हो रही होतीं।मुझे विश्वास है
“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”इत्यादि योजना नारियों की स्थिति मे सुधार लाएँगी।पर समाजिक स्तर पर आज भी बहुत सुधार जरुरी है।
इस तस्वीर मे मैंने कुछ
तकलीफ कुछ कुरीतियां कुछ सच को उजागर करने की एक कोशिश की है और कई बार आंखें नम हुई मेरी” नारी जीवन ” के इन पहलुओं को उजागर करते करते।
कि
कैसे
समाज मे ” भ्रूण हत्या ” के नाम पर किसी जीवन को गर्भ में ही सुला दिया जाता है।
जो यहाँ से आगे बढ़ गयी वो ” बाल विवाह  ” की वेदी चढ़ गई।जो पढ़ी-लिखी आगे बढी तो समाज मे “छेड़छाड़ “,”लूट”, से बचती हुई अपनी अस्मिता को भूखे भेड़ियो से बचाती हुई , कोई “बेमेल विवाह” तो कोई “शराब के नशे” मे धुत नाग का जीवन भर दंश झेलती रह जाती है।
“दहेज प्रथा “
या कुप्रथा कहूँ?
इस दानव ने अब तक जाने भारत की कितनी बेटियो को निगल लिया।
यहाँ भारत माता को भी नारी की स्थिति देखकर विहल होते दिखाया है।
क्या बेटियाँ…बेटों से कम है किसी मामले में?
नहीं वो तो कन्धे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ रही है और कई मामलो मे कहीं आगे निकल गईं।
तब भी आज छोटी से छोटी बच्चियाँ भी घर से बाहर क्या घर मे भी सुरक्षित नहीं
जब से बेटियाँ पैदा होती है तब से लेकर अर्थी उठने तक हर गलती की दोषी रहती है और हर उंगली उसके तरफ उठती है।क्या बेटी होने की इतनी बड़ी सजा है कि उनपर हुए अत्याचार कभी कभी जानकर रूह कांप उठते है।
जिस बेटी को डोली मे अरमान से बिठा कर रो रो कर विदा करते है।चंद रुपयो के लिये विदाई के आँसू सूखने के पहले ही उसके मौत की खबर आ जाती है।
मार,पीट,प्रताड़ना क्या सिर्फ इसलिये के वो दोनो कूल की रस्मे निभाने को खुद को समर्पित कर देती है?
जीने का अधिकार सबको है फिर अशिक्षा,असुरक्षा और अस्मिता का दँश मुख्यतः महिलाएँ ही झेलती है।
इस तस्वीर मे दिखाया गया है की
कैसे बेटियाँ पैदा होती है तो तोते की तरह खट्टा मीठा बोलती है,
मछलियों सी चंचल जो कभी रुकती नही कभी थकती नही , एक हथिनी सा ऐश्वर्य और ताकत लिये मंजिल की तरफ बढती है।
कछुआ यहाँ उनके एक से दुसरे अवस्था मे यानी किशोर से वयस्क अवस्था मे परिवर्तन बता रहा है।
यहाँ भरे है चील-कौए-शेर-नाग समाज के अभद्र लोगो को इंगित कर रहे हैं।जिनका सामना नारियाँ कदम कदम पर करती हैं।
और ये हरी बेल इस समाज के लोग है जो पूरी तसवीर मे है पर उन्हें आस पास की घटनाओ से कहीं कोई फर्क नहीं पड़ता है, अगर कोई एक कदम भी बढ़ा दे तो शायद एक बेटी की जान बच सकती है।
लेकिन
इतना सब झेल कर जो नारी आगे बढ़ जाती है वो ही अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखवाकर पथप्रदर्शक बनती है और उदाहरण स्थापित करती है के
क्यू नारियाँ पूजित होनी चाहिए समाज में, क्यू नारियाँ है हर मामले मे बराबरी की हिस्सेदार,
क्यू नारियों को ही दिया गया सृजन का अधिकार।
अंत मे मयूर और कबूतर बता रहे कि कैसे शांति की दुत और खुबसूरती की ये ममतामयी।
मुर्ति एक नये राष्ट्र का निर्माण कर सकती है और सकारात्मक
विचारो का एक नया सूरज आगाज कर सकती है।
“जहाँ पूजित होंगी नारियाँ
वहाँ होगा एक मुकम्मल जहान
वहीं उदित होगा सूरज नया”
लेखक: कुन्दन कुमार रॉय

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