ये हैं बिहार के कुछ अनोखे गाँव, जानकार आप भी करेंगे सलाम…


बिहार के बारे में आपने कई बुरी बातें सुनी या पढ़ी होंगी। लेकिन आज हम आपको बिहार के एक दूसरे रूप से रूबरू करवा रहे हैं….

भारत का इकलौता गांव जिसने तीन पद्म श्री पुरस्कार अपने नाम किया

यह बिहार का एक ऐसा गांव है जिसने एक नहीं बल्कि तीन-तीन पद्मश्री पुरस्कार अपने नाम किया है. अभी कुछ दिन पहले तीसरा पद्मश्री पुरस्कार बौआ देवी को मिला है.मिथिला पेंटिंग के गढ़ माने जाने वाले जितवारपुर गांव की दो महान शिल्पी जगदम्बा देवी और सीता देवी पद्मश्री अवार्ड से पहले ही सम्मानित हो चुकी हैं।

बिहार का यह गांव है 100 करोड़ टर्नओवर वाला

उद्योग धंधों की स्थापना के लिए बिहार में विशेष राज्य का दर्जा और इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी का शोर तो बहुत सुनाई दिया लेकिन इन सब के इतर नेपाल के सीमावर्ती इलाके में बिहार का एक गांव ऐसा भी है जो बिना किसी सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन के उद्योग-धंधों वाले गांव के रूप में अपनी पहचान बना चुका है. कमाई इतनी कि इस गांव का टर्नओवर 100 करोड़ से ऊपर का हो चुका है. छोटे से गांव में 90 उद्योग लगाए जा चुके हैं और जिन इलाकों से मजदूरों के पलायन की खबरें आती थी आज उसी इलाके में निर्मित मशीनें बिहार के अलावा दूसरे राज्यों में बिक्री के लिए भेजी जा रही हैं.

हम बात कर रहे हैं शीतलपुर नाम के एक गांव की. बिहार और नेपाल की सीमा पर स्थित रक्सौल जिले के इस गांव में 37 साल पहले शुरु हुई छोटी मुहिम क्रांति का शक्ल ले चुकी है. बेरोजगारी के लिए चर्चित बिहार में इस गांव के हर युवक के पास रोजगार है तथा एक मजदूर की प्रेरणा से अब तक 90 उद्योग लगाए जा चुके हैं.शीतलपुर गांव में चावल बनाने वाली सेलर मशीन बनाने के रोजगार में 15000 लोग जुड़े हुए हैं तथा 90 इकाइयां अकेले इस गांव में स्थापित हो चुकी हैं.

शीतलपुर में बनी मशीनें बिहार के अलावा झारखंड, हरियाणा, पंजाब, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा और यूपी तक में बिकती हैं. इसके अलावा जिस नेपाल में वासुदेव शर्मा कभी चावल बनाने की मशीन वाली फैक्ट्री में काम करते थे आज उसी नेपाल में इनकी बनाई मशीन बेची जा रही हैं.

पहला पूर्ण साक्षर मतदाता गांव

यह गांव भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का हैं. पूर्ण साक्षर होने के बाद अब इस गांव में पंचायत चुनाव में कोई भी व्यक्ति मतदान में अंगूठे का निशान नही लगाता है सभी हस्ताक्षर करते है।

बिहार के इस गांव में बेटी के पैदा होने पर आम के पेड़ लगाते हैं माता-पिता

बिहार के भागलपुर जिले के धरहरा गांव में लोग लड़की के जन्म को एक समृद्धि के तौर पर देखते हैं और जन्म के बाद गांव में ही एक आम का पेड़ लगा दिया जाता है। ये लड़कियां जब बड़ी हो जाती हैं तो आम के उस पेड़ को अपनी सहेली मानती हैं और उसकी देखभाल करती हैं।बिहार के सीएम नीतीश कुमार भी इस गांव आ चुके हैं। 2010 में जब वे यहां आए थे तो गांव की एक बेटी लवी का जन्म हुआ था। सीएम ने उसके नाम पर एक आम का पेड़ लगाया था।

bihar village

इंजीनियर गांव

बिहार के गया जिले का पटवा टोली गांव ‘IIT हब’ बनकर उभरा है। पिछले कुछ सालो में तमाम सुविधाएं से वंचित इस गांव के एक-दो नहीं, बल्कि 300 से ज़्यादा छात्र आईआईटी में पास हुए है . एक गांव से इतने स्टूडेंट का एक साथ IIT में सफल होना दूसरों के लिए भले सुखद हैरानी पैदा करता हो लेकिन इन गांव वालों के लिए यही चुनौती बन गया है की अगले साल अब इससे अच्छा रिजल्ट देना होगा . इस सबसे हटकर ये गांव बिहार के लोग पढाई में सबसे अव्वल क्यों है .. ये दिखाता है .

बिहार के इस गांव में मोर ही मोर

बिहार के सहरसा जिला का आरण एक ऐसा गांव है जिसकी पहचान ही अब ‘मोर के गांव’ के रूप में होने लगी है। इस गांव में प्रवेश करते ही आपका स्वागत मोर ही करेंगे। कोई किसी दरवाजे पर दाना चुगता नजर आ सकता है तो कोई किसी घर में घुस कर अनाज की बोरी पर हाथ साफ करता. कोई किसी ग्रामीण महिला के हाथ से रोटी सब्जी खाता नजर आ सकता है तो कोई बीच सड़क पर पंख फैलाये नाचता. आरण गांव के लोगों को यह नजारा सहज ही उपलब्ध है जिसकी एक झलक पाने के लिए लोग तरसते रहते हैं. ग्रामीणों के हिसाब से यहाँ पांच सौ से अधिक मोर बास करते हैं. रोचक जानकारी यह है कि महज 25 साल पहले पंजाब से लाये गये एक जोड़ी मोर-मोरनी से उनका कुनबा फ़ैल कर इतना बड़ा हो गया है.

बिहार के इस गांव के एक ही गांव का दूल्हा और दुल्हन

बिहार का एक एेसा अनोखा गांव है, जहां एक ही गांव का दूल्हा और उसी गांव की दु्ल्हन।यहां एक ही गांव में बेटियां ब्याह दी जाती हैं। यह गांव है सहरसा जिला मुख्यालय से छह किमी की दूरी पर बसा बनगांव। इस गांव की दूसरी खासियत यह है कि यह देश का अकेला गांव है, जहां के लोगों का उपनाम हिंदू होने के बावजूद खां है। इस गांव का नाम सुनते ही बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाईं के साथ-साथ विद्धान, पंडितों, सेनानियों एवं प्रशासकों का नाम उभरकर आने लगता है। लेकिन यह गांव एक और अर्थ में अनूठा है। यहां गांव की अधिकांश लड़कियों की शादी उसी गांव में होती है। यह गांव अाइएस और आइपीएस के गांव के रूप में भी जाना जाता है।

बिहार का सबसे छोटा गांव

यह गांव है,बिहार के बिक्रमगंज अनुमंडल के दिनारा प्रखंड के चिताव का मनसापुर गांव। गांव की पूरी आबादी मात्र 18 है। रोचक है कि ये सभी 18 लोग एक ही परिवार के सदस्य हैं। फिर भी गांव पक्की सड़क से जुड़ा है। गांव में बिजली भी है। इसके अलावा सामुदायिक भवन और पशु अस्पताल भी है।

 

साभार: बिहार चौपाल


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