भारतीय इतिहास में पहली बार आज ही डाला गया था वोट, जीत दर्ज कर एक बिहारी बना था पहला जननेता

जानकारी

तिरहुत सरकार महाराजा लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह 1883 में शाही परिषद के लिए निर्वाचित होनेवाले पहले भारतीय जनप्रतिनिधि हैं। वैसे तो भारतीय को वोट का अधिकार 1873 में ही मिल गया था, लेकिन वोट का प्रयोग पहली बार 1893 में आकर हुआ। इससे पहले या तो विधान के सदस्‍य मनोनीत होते थे या फिर सर्वसम्‍मति से चुन लिये जाते थे। 1883 में विधान के लिए सर्वसम्‍मति से निर्वाचित लक्ष्‍मीश्‍वर सिं‍ह को दोबारा सदस्‍य बनाने के लिए तत्‍कालीन वायसराय सह गर्वनर जेनरल द मार्कस ऑफ लैंसडाउन तैयार नहीं थे। पिछले 10 वर्षों में लक्ष्‍मीवर सिंह ने सरकार को सदन में कई मसलों पर नीति बदलने या उसमें संशोधन करने पर मजबूर कर दिया था। ऐसे में उनका दोबारा सदन में आना सरकार के लिए सिरदर्द से कम नहीं था।

इधर इंडियन एसोसिएशन और राष्‍ट्रीय कांग्रेस जैसे संगठन लगातार देश में लोकतंत्र के प्रति जागरुकता पैदा करने का काम कर रहे थे। तत्‍कालीन वायसराय सह गर्वनर जेनरल द मार्कस ऑफ लैंसडाउन ने बडी चतुराई से लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह की जगह बिहार के सबसे बडे वकील सैयद सफीउद्दीन का नाम प्रस्‍तावित कर दिया। सैयद सफीउद्दीन के नाम का जैसे ही एलान हुआ वैसे ही लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह ने अपना परचा दाखिल कर दिया। भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहला मौका था जब सदन की एक सीट के लिए दो उम्‍मीदवार परचा दाखिल किये थे। नाम वापस लेने की आखिरी तारीख तक वायसराय सह गर्वनर जेनरल द मार्कस ऑफ लैंसडाउन इस इंतजार में रहे कि लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह अपना नाम वापस ले लेंगे। पहले तो उन्‍हें रुलिंग चीफ बना देने का आश्‍वासन दिया गया, लेकिन कहा कि बनने के बाद इस्‍तीफा दे दूंगा। इसके बाद वायसराय सह गर्वनर जेनरल द मार्कस ऑफ लैंसडाउन ने इसे सांप्रदायिक रंग भी देना चाहा लेकिन वो भी बेअसर रहा।

अतत: मई 1893 में पटना नगर निगम, पटना बोर्ड, स्‍नातक और शिक्षक मतदाताओं को भारत में पहली बार हुए मतदान में मताधिकार का उपयोग करने का अवसर मिला। इस प्रकार लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह भारत के पहले जनप्रतिनिधि हुए जबकि सैयद सफीउद्दीन भारत में चुनाव हारनेवाले पहले उम्‍मीदवार बने। वैसे बाद में सैयद सफीउद्दीन कलकत्‍ता हाइकोर्ट के पहले भारतीय न्‍यायाधीश बने। आज भारत लोकतंत्र की नींव रखनेवाले इन दोनों विभूतियों को भूल चुका है। बात केवल भारत के पहले जनप्रतिनिधि की नहीं है। आप किताब से गुगल तक खंगाल लीजिए कलकत्‍ता हाइकोर्ट के पहले मुख्‍य न्‍यायाधीश का नाम मिलेगा लेकिन पहले भारतीय न्‍यायाधीश का नाम कहीं भी दर्ज नहीं है। है ना कमाल का इतिहास हमारे वामपंथी इतिहासकारों का.

कुमुद सिंह कहती है कि कोलकाता में स्‍थापित तिरहुत सरकार महाराजा लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह की यह प्रतिमा एक मायने में देश में अकेली और अनोखी प्रतिमा कही जा सकती है। इस प्रतिमा का अनावरण करने भारत के वायसराय द अर्ल ऑफ एल्गिन जब आये तो उन्‍हें यह जानकार आश्‍चर्य हुआ कि तिरहुत के महाराजा की प्रतिमा को कलकत्‍ता में स्‍थापित करने के लिए कलकत्‍ता के आम लोगों ने अपने खर्चे से बनवाया है। यह देश में एक मात्र उदाहरण है जब किसी दूसरे प्रांत के लोगों ने पैसे जमा कर किसी दूसरे प्रांत के राजा की प्रतिमा अपने प्रांत में स्‍थापित की हो। यह कलकत्‍ता के प्रति तिरहुत का और तिरहुत के प्रति कलकत्‍ता का संबंध बताता है। इस इलाके को यूनेस्‍को ने धरोहर घोषित कर रखा है।

आज भी किसी की मूर्ति जनता यूं ही अपने पैसे से नहीं लगा देती है, फिर वो जमाना तो राजाओं का था। कोलकाता की जनता ने अगर अपने पैसे से तिरहुत सरकार की मूर्ति चौराहे पर लगा दी। तो यह जानने की इच्छा जरूर बढ जाती है कि आखिर इन्होंने ऐसा क्या किया, जो राज्‍य के बाहर की जनता भी इन्‍हें अपना आदर्श मानने से परहेज नहीं किया।

दरअसल तिरहुत सरकार लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह महज 40 वर्ष की उम्र में स्वर्गवासी होने से पूर्व कई सामाजिक और वैज्ञानिक क्रांति की शुरुआत की। बहु विवाह पर रोक लगाने के लिए इन्होंने अपने कार्यकाल में दंड का प्रावधान किया। गौ रक्षा संघ के संस्थापक बने। अंग्रेजी शिक्षा व एलोपैथी चिकित्सा को बढावा दिया। इनके कार्यकाल में ही अंग्रेजी स्कूल व मेडिकल डिसपेंसरी की स्थापना हुई। भारत में जैविक क्रांति के अगुआ रहे और जर्सी गाय की नस्ल इनके कार्यकाल की सबसे बडी देन है। तिरहुत स्टेट रेलवे की स्थापना कर इन्होंने तिरहुत में विकास की एक नयी लकीर खींच दी। तिरहुत सरकार लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह ने ही तिरहुत में औद्योगिक क्रांति का सबसे पहले सपना देखा।

दरभंगा सूत कारखाने की स्थापना और नील की खेती खत्म करने का सैद्धांतिक फैसला उनके विकास मॉडल को रेखांकित करता है। इंपिरियल कॉउंसिल के पहले भारतीय सदस्य रहे तिरहुत सरकार लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह बहादुर साह जफर के बडे पोते को राजनीतिक संरक्षण देकर राष्ट्रीय स्‍तर पर स्‍वतंत्रता आंदोलन को जिंदा रखने का एलान किया। अफ्रीका में गांधी को मदद करनेवाले पहले भारतीय बने। कांग्रेस के पालनहार बन कर उसकी नींव मजबूत की। पूणा सार्वजनिक सभा के संरक्षक बने। रूलिंग किंग का दर्जा नहीं मिलने के बावजूद कोलकाता में गवर्नर से सलामी लेनेवाले तिरहुत सरकार हिंदू-मुस्लिम एकता के भी प्रतीक माने जाते हैं।

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