हरितालिका तीज आज, तैयारी पूरी

आस्था

अखंड सौभाग्य की कामना लिए महिलाएं गुरुवार को यानि आज होने वाले हरितालिका तीज व्रत की तैयारी में जुट गई है। इसका नजारा घर की चहारदीवारी से लेकर बाहर बाजार तक दिख रहा है। बुधवार को पूरे दिन शहर में महिलाओं की भीड़ दिखी। सौंदर्य प्रसाधन की दुकानों से लेकर ब्यूटी पार्लर तक देर शाम तक गुलजार रहे।

बाजार में कई जगह महिलाएं हाथों पर मेंहदी सजवाते हुए भी नजर आईं। शहर के बाज़ारों में सुबह से ही भीड़ दिखी। श्रृंगार सामग्री की दुकानों पर चूड़ी, कंगन व अन्य सौन्दर्य सामग्रियों के साथ मेंहदी आदि की भी खरीददारी की।

कपड़े की दुकानों पर भी खरीददारी के लिए भीड़ लगी रही। इसके साथ ही महिलाओं में सजने-संवरने को लेकर भी होड़ दिखी। इसके चलते ब्यूटी पार्लरों में लाइन लगी थी। बाजार में कई जगह मेंहदी सजाने के लिए बैठे युवकों के पास भी कुछ ऐसा ही नजारा दिखा।




पटना के मौर्य लोक, हथवा मार्किट और खेतान मार्किट आदि जगहों पर बड़ी संख्या में मेंहदी सजाने वाले बैठे थे, जिनके यहां महिलाओं की कतार लगी रही। तीज व्रत पर दान के लिए सामानों की भी बिक्री हो रही है। दान सामग्री का पैकेट बनाकर कई दुकानदार बैठे है।

देर शाम तक तीज के चलते चहल-पहल दिखी। ‘होएहु संतत पियहीं पियारी, चिर अहिवात असीस हमारी तीज व्रत पर विशेष: 0 पति की दीर्घायु के लिए महिलाएं आज रखेंगी निर्जला व्रत 0 सदियों से चली आ रही है सुहागनों के बीच यह परम्परा बलिया।




सृष्टि में जन्मी हर स्त्री की यह कामना होती है कि वह सदा सुहागन रहे। कामनाओं की पूर्ति के लिए सौभाग्यवती स्त्रियां वर्ष में एक बार भाद्रपद शुक्ल के तृतीया को 24 घंटे का निर्जला उपवास रखती हैं।

वे अपने पति के चिर दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं, जिसे हरितालिका (तीज) व्रत कहा जाता है। व्रत के नियम के मुताबिक स्त्रियां पूरे दिन निर्जला व्रत रखकर शाम को नदियों या पवित्र सरोवरों में स्नान करती हैं।




हरितालिका




शिवालयों में जाकर शंकर-पार्वती का विधिवत पूजन-अर्चन करती हैं तथा आचार्यों के मुख से तीज व्रत की कथा श्रवण करती हैं। कथा श्रवण के बाद दान करने का भी महात्म्य है। पुन: घर जाकर रातभर निर्जला व्रत जारी रखती है और 24 घंटे बाद यानि अगले दिन सुबह निर्धारित समय पर जल ग्रहण कर कठिन व्रत का परायण करती हैं।

धार्मिक ग्रंथों में भी वर्णित अनेक प्रसंगों के माध्यम से स्त्री के लिए उसके पति को ही सबकुछ माना गया है। रामचरित मानस में वर्णित प्रसंगों में सीता की माता सुनयना और पार्वती की माता नयना ने विदाई के वक्त अपनी-अपनी पुत्रियों को संदेश दिया है कि- ‘होएहु संतत पियहीं पियारी, चिर अहिवात असीस हमारी।’




तथा ‘करहू सदा शंकर पद पूजा, नारि धरम पतिदेव न दूजा।’ सती अनसुइया ने भी वन की कुटिया में सीता को आशीष देते हुए कहा है- ‘सदा सुहागन होहु तुम्ह, जब लगि महि अहि सीस।’ अर्थात-हे सीते, तुम तब तक अखंड सौभाग्यवती रहो, जब तक इस पृथ्वी को शेषनाग अपने सिर पर धारण करते रहें।

इनकी तो रोटी की जुगाड़ में गुम हो गई तीज! कटानग्रस्त गांवों के ग्रामीणों का नदियों के उफान का सामने करने के बाद न तो हौसला बचा है, न ही कोई उम्मीद…। ऐसे में चौथ-तीज का उमंग दो जून की रोटी के जुगाड़ में गुम हो गया है।




दूसरों के रहम पर जैसे-तैसे अपना और परिवार का पेट पाल रहे लोगों को पता ही नहीं चलता की कौन त्योहार बीत गया तथा कौन आने वाला है। औरतें तो यह भी नहीं जान पाईं कि चौथ कब आया और कब गया या फिर तीज भी आ गया है।

बाढ़ व कटान से बेघर होकर दूसरों के यहां शरण ले रही महिलाएं बेबसी में सबकुछ भूल गई हैं। कई नई-नवेलियों को मायके भेज दिया गया है, तो कुछ आस-पास के रिश्तेदारों के घर में हैं। ऐसे में पति के दीर्घायु की प्रार्थना तो मन ही मन कर रही है, लेकिन कोई उमंग नहीं दिख रहा। न हाथों में मेंहदी लगी, न पांव में महावर।







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