लोक आस्था का महापर्व छठ शारदा सिन्हा के गीतों के बिना अधूरा है

आस्था

लोकगीतों की परंपरा को समृद्ध बनाने के लिए जिन कुछ चुनिंदा लोगों ने कार्य किया है, शारदा सिन्हा उनमें से एक हैं।उन्होंने हर विधा में कार्य किया है, पर छठ के गीतों के लिए वह सबसे अधिक प्रख्यात हैं। खासकर बिहार और पूर्वाचल में छठ पर्व शारदा सिन्हा के गीतों के बिना अधूरा माना जाता है। पद्म श्री शारदा सिन्हा को पूरा देश उनके गायकी के लिए जानता है। भोजपुरी में शालीन गीतों के मामले में आज भी उनका डंका बजता है। अक्सर लोग उनके गाए गीतों को गुनगुनाते हुए मिल जाते हैं।

शारदा सिन्हा का जन्म 9 अक्टुबर 1952 को बिहार में हुआ था। इनके लोकगीतों की लोकप्रियता इतनी है कि उसके लिए उन्हें ‘बिहार-कोकिला’ एवं ‘पद्म श्री’ सम्मान से विभूषित किया गया है। इन्होंने मैथिली, बज्जिका, भोजपुरी के अलावे हिंदी गीत गाए हैं।
सलमान खान की ‘मैंने प्यार किया’ तथा ‘हम आपके हैं कौन’ जैसी फिल्मों में इनके द्वारा गाए गीत काफी प्रचलित हुए हैं। वहीं, हालिया रिलीज ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में ‘इलेक्ट्रिक पिया’ गीत गाकर इन्होंने धमाल मचा दिया। यह गीत युवाओं की जुबां पर है। भोजपुरी में इनके द्वारा गाए गीतों की लोकप्रियता आज भी बहुत ज्यादा है। बिहारियों का महापर्व कहे जाने वाले ‘छठ’ पर इनके द्वारा गाया गया गीत ‘ सुगा मेड़राए’ आज भी काफी पॉपुलर है।
छठ पर्व पर शारदा सिन्हा कहती हैं कि तमाम पर्व-त्योहारों ने अपनी मूल जड़ें खो दी हैं। पर छठ अभी भी अपने मूल स्वरूप में है। क्योंकि यह लोक पर्व है। इस पर्व में भगवान भास्कर की पूजा की जाती है। जो पूरी सृष्टि के जीवन दाता हैं। जैसे-जैसे बिहार और पूर्वाचल के लोग बाहर निकले वैसे-वैसे छठ ने विस्तृत फलक पर अपनी जगह बना ली और मुखर हो गया। देश के हिंदी पंट्टी के राज्यों में ही नहीं अब विदेशों में भी छठ धूमधाम से मनाया जाता है। मेरे नजरिए से छठ अब वैश्विक (ग्लोबल) पर्व बन गया है। छठ पर सार्वजनिक अवकाश होना चाहिए। क्योंकि महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों की भी इसमें बराबर की हिस्सेदारी होती है।
छठ के दौरान गीतों की परंपरा बहुत पुरानी है। ऋगवेद में भी इसका जिक्र मिलता है। छठ के दौरान निर्जला व्रत रखा जाता है। गीत पर्व की गरिमा को बढ़ाने का कार्य करते हैं। साथ ही गीतों की वजह से छठ व्रतियों में नीरसता और बोरियत नहीं आती है। गीत पर्व की महत्ता को भी बढ़ाते हैं। छठ के गीतों की इतनी मांग है कि हम उसे पूरा नहीं कर पाते हैं। अच्छे गीत नहीं लिखे जा रहे हैं। जब अच्छे गीत ही नहीं होंगे तो सुनाई भी नहीं देंगे।

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