महाराष्ट्र के स्वयंभू गणपति, करीब 400 साल पुराना है मंदिर

आस्था

महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र को प्रकृति का उपहार माना जाता है। यहां हरियाली, समुद्री तट और पहाड़ियां तीनों नजर आते हैं। रत्नागिरि जिले के ऐसे खूबसूरत समुद्री तट यानी अरब सागर के किनारे भगवान गणेश का एक बेहद आकर्षक मंदिर है। ये मुंबई से लगभग 375 किलोमीटर दूर प्रकृति की गोद में विराजित स्वयंभू गणपति मंदिर है। जो कि गणपतिपुले नाम के छोटे से गांव में स्थित है।

  • पश्चिम द्वार देवता के रूप में होती है पूजा

महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में सागर की रेत के किनारे एक पहाड़ की तलहटी पर श्री गणपतिपुले मंदिर स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन करने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। मान्यता है कि गणपति पुले में गणपति भगवान, प्रकृति की गोद से स्वयं उत्पन्न हुए हैं। यहां भगवान गणेश को पश्चिम द्वार देवता के रूप में माना जाता है। यहां भगवान गणेश की स्वयंभू प्रतिमा के दर्शन के लिए दूर दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। खासतौर पर बुधवार के दिन इस मंदिर में भारी संख्या में भक्त पहुंचते हैं।

  • 400 साल पुराना है मंदिर 

मंदिर में भक्तों का तांता सालभर लगा रहता है व गणेशोत्सव के दौरान यहां की रौनक आकर्षण का केंद्र होती है। यहां स्थित स्वयंभू गणेश मंदिर पश्चिम द्वारदेवता के रूप में भी प्रसिद्ध है। यह मंदिर 400 साल पुराना है। मंदिर में स्थित गणेश जी की मूर्ति एक अखंड चट्टान से बनी हुई है। जो भक्तों को आकर्षित करती है। मान्यता है कि भगवान गणपति यहां स्वयं प्रकट हुए थे। 

  • सपने में दिए थे दर्शन 

मान्यता है कि जिस स्थान पर अभी मंदिर है वहां एक ब्राह्मण रहते थे। एक दिन भगवान गणेश ने उन्हें सपने में कहा कि यह पहाड़ी मेरा निराकार रूप है और जो भी व्यक्ति मेरी पूजा करेगा मैं उसके सभी संकट खत्म कर दूंगा। इसी दौरान ब्राह्मण की एक गाय जो दूध देना बंद कर चुकी थी, एक दिन उसके थन से दूध निकलने लगा। जब उस स्थान की सफाई की गई तब वहां गणेश की वही मूर्ति मिली जो ब्राह्मण ने सपने में देखी थी। इसके बाद मंदिर का निमार्ण कराया गया।

Sources:-Dainik Bhasakar

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