महाभारत में कर्ण ने की थी छठ मइया की पूजा, रामायण में सीता और राम ने

आस्था

सूर्यपासना के महापर्व छठ साल में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है।

ज्योतिष मर्मज्ञ पं.कमलापति त्रिपाठी ‘प्रमोद’ बताते हैं कि सुख-समृद्धि की कामना और दूसरे मनोरथों की पूर्ति के लिए छठ पूजा की जाती है। चार दिनों तक चलने वाला यह महापर्व पवित्रता और प्रकृति से मानव के जुड़ाव का उत्सव है। इसमें ऊर्जा के अक्षय स्नोत सूर्य की आराधना की जाती है और वह भी सरोवरों, नदियों या पानी के अन्य स्नोतों के किनारे।



छठ पूजा से जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हैं। पुत्र प्राप्ति के लिए राजा प्रियंवद ने किया था व्रत पुराण में बताया गया है कि राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं था। महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। जिससे उन्हें पुत्र हुआ, लेकिन वह भी मरा हुआ। उस मृत पुत्र को लेकर राजा श्मशान गए और वहीं पुत्र वियोग में अपने प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं।

उन्होंने बताया कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण वे षष्ठी कहलाती हैं। उन्होंने राजा को अपनी पूजा करने और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करने की सलाह दी। राजा ने पुत्र प्राप्ति के निमित्त देवी षष्ठी का व्रत किया। जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। राम जानकी ने भी की थी सूर्य पूजा ऐसी मान्यता है कि लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने व्रत रखते हुए सूर्यदेव की पूजा की।



सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। यही परंपरा अब तक चली आ रही है। सूर्य पुत्र कर्ण ने शुरू की पूजा एक दूसरी मान्यता के अनुसार, छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। कहा जाता है कि सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। वे भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह नित्य घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अघ्र्य देते थे। भगवान सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अघ्र्य दान की वही परंपरा प्रचलित है।



पांडवों को वापस मिला राजपाट छठ पर्व से जुड़ी एक कथा के अनुसार, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। उनकी मनोकामनाएं पूरी हुईं और पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। लोक परंपरा के अनुसार, सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई है।

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