प्रदूषण ने हमारे पर्यावरण को हानिकारक रूप से प्रभावित किया हैं। प्राचीन समय से मनुष्यों ने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया हैं। पर्यावरण प्रदूषण न केवल मनुष्यों के जीवन के लिए बल्कि जानवरों के लिए भी खतरनाक हो गया हैं। मनुष्यों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने में व्यापक रुप से प्रदूषण मुख्य कारक हैं। 

बिहार पर्यावरण पर जागरूक होने वाला देश का पहला राज्य है। जल-जीवन-हरियाली योजना का जमीनी स्तर पर लागू किये जाने का निर्णय सराहनीय है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस दिशा में पहल कर योजना को पूरे राज्य में लागू करने का निर्देश दिया है, जो कि उल्लेखनीय है।बिहार विधान परिषद में गुरुवार को सुबह 10 बजे से 12 बजे तक ‘ जल-जीवन-हरियाली योजना’ विषय पर आयोजित विशेष वाद-विवाद के दौरान सदन में सदस्यों ने ये बातें कही। उन्होंने इसके ठीक से क्रियान्वयन को लेकर कई सुझाव भी चिंता, शंका-आशंकाएं भी जताईं।

सदस्यों ने यह भी कहा कि इसमें समाज के सभी वर्गो का सहयोग होना चाहिए। पर्यावरण संकट से निबटने की दिशा में राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

योजना को लागू करने के दौरान निगरानी की भी पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए ताकि अन्य योजनाओं की तरह ही यह कागज पर ही सिमट कर न रह जाए। सदस्यों ने विश्व व देश एवं प्रदेश में पर्यावरण संकट व भविष्य की आशंकों को लेकर चिंता भी जतायी।इस आयोजन में सत्ता व विपक्ष के कुल 10 सदस्यों ने अपने विचार रखें। अंत में सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री श्रवण कुमार ने जल-जीवन-हरियाली योजना के तहत किए जा रहे कार्य व दिशा-निर्देशों की जानकारी दी।

श्रवण कुमार ने कहा कि राज्य में पारिस्थितकीय असंतुलन को देखते हुए मुख्यमंत्री ने बिहार के सभी प्रखंडों एवं पंचायतों में जल-जीवन हरियाली मिशन को लागू करने का निर्णय लिया है। जल, जीवन, हरियाली योजना को सुचारू रुप से संचालित करने के लिए इसमें 15 विभागों को शामिल किया गया है। इस योजना पर राज्य सरकार अगले तीन साल में 24 हजार 524 करोड़ रुपये खर्च करेगी। 2019-20 में 5870 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि राज्य में पहले नौ फीसदी हरियाली थी जो अब बढ़कर 15 फीसदी हो गयी है, इसे 17 फीसदी करने का लक्ष्य है। लोगों को पौधों का महत्व बताने की आवश्यकता है। एक सामान्य पेड़ एक साल में 20 किग्रा. धूल सोखता है। वही,हर साल 700 किग्रा. ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है तथा 20 टन कार्बन डाई-ऑक्साईड सोखता है। गर्मियों में एक पेड़ के नीचे सामान्य से चार डिग्री तक कम तापमान रहता है। इस प्रकार देखा जाए तो घर के पास यदि 10 पेड़ लगें हों तो मानव का जीवनकाल करीब सात साल तक बढ़ जाएगा। बिहार में इस योजना के तहत ग्रामीण विकास विभाग की 26 हजार 39 एवं अन्य विभागों की 6 हजार 742 कुल 32 हजार से भी अधिक योजनाओं का उदघाटन एवं शिलान्यास मुख्यमंत्री के द्वारा किया गया। इस पर कुल 1 हजार 359 करोड़ 39 लाख रुपये खर्च का अनुमान है। यह कार्य जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न स्थिति से मुकाबला करने की शुरूआत है, बुनियाद डाली गयी है। उन्होंने इस योजना में सभी दलों के प्रतिनिधियों एवं आमजनों के सहयोग की अपेक्षा जतायी।

प्रो. रामचंद्र पूर्वे ने इस योजना की सराहना की, साथ ही कहा कि इसे लागू करने के दौरान ध्यान देना होगा कि अन्य योजनाओं की तरह यह महज कागजों पर ही सिमट कर न रह जाए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संकट का नतीजा सभी को झेलना पड़ रहा है। प्रो. रामवचन राय ने कहा कि गंगा की संस्कृति ही पटना में विकसित नहीं हुई। पता नहीं किस मुर्हत में इस शहर को बसाया गया। बनारस में गंगा की ओर मुख कर के सभी घर है जबकि पटना में गंगा की ओर पीठ किए घर है और नालियां निकाली गयी है। बिहार देश का पहला राज्य है जो पर्यावरण चेतना के प्रति पहले जागरूक हुआ है। पर्यावरण संकट का परमाणु बम से भी ज्यादा प्रभाव पड़ने वाला है।

आदित्य नारायण पांडेय ने कहा कि भू-माफियाओं की वजह से राज्य में आहर-पईन, नदी, पोखर सब का अतिक्रमण कर लिया गया है। इसे मुक्त कराने की जरूरत है। संजय पासवान ने माइक्रो प्लास्टिक के वजूद को लेकर चिंता जाहिर की और कहा कि जीवन को खतरे से बचाने की जरूरत है। खालिद अनवर ने कहा कि विश्व में पर्यावरण संकट को लेकर हो रही पहल में बिहार भी शामिल हो चुका है। संजीव कुमार सिंह ने कहा कि भौतिक सुखों के कारण हमारे शरीर में पांच मूल तत्व भी प्रदूषित हो चुके है। जबकि संजीव श्याम सिंह ने कहा कि प्रदूषण को लेकर बढ़ती आबादी को प्रमुख कारण बताया। उन्होंने कहा कि बिहार में कारखाने अधिक नहीं है इसलिए इसे कारण नहीं बताया जा सकता। रजनीश कुमार ने कहा कि गंगा की संस्कृति, पूर्वजों के संस्कार को पुन: जीवन में उतारने की जरूरत है, तभी संकट से निजात मिलेगा। सुबोध कुमार ने कहा कि पर्यावरण संकट के लिए हम सभी दोषी है। इसलिए मिलकर ही समाधान निकालना होगा

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