‘तन्नू’ से ‘मैथिली ठाकुर’ बनने की दिलचस्प कहानी….

एक बिहारी सब पर भारी

राइजिंग स्टार रनर-अप का खिताब जीतने वाली बिहार की बेटी मैथिली ठाकुर के बिहार लौटने की खबर के बाद पूरे बिहार सहित मैथिली के प्रशंसकों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी है. मैथिली के गृह जिला के पैतृक गांव उड़ेन, बेनीपट्टी के अमरकांत ठाकुर, ध्रुव नारायण ठाकूर, वशिष्ठ नारायण ठाकूर, कमलकांत ठाकुर, अमोदानंद ठाकुर, आनंद ठाकूर, रतीश चौधरी मैथिली के चाचा राकेश ठाकूर सहित ग्रामीणों ने ख़ुशी व्यक्त करते हुए बताया कि मैथिली के गांव लौटने से गांव में उत्सवी माहौल है.

 

मैथिली के आने की खबर पाते ही मैथिलि से मिलने के लिए यहां लगातार लोगों का आना जाना लगा हुआ है. मैथिली के दादा शोभासिंधु ठाकुर उर्फ़ बच्चा ठाकुर ने कहा कि हमें अपनी पोती पर गर्व है. मैथिली पहले अपने परिवार के नाम से जानी जाती थी. लेकिन लोगों के प्यार के कारण मैथिली ने जो काम किया है उससे हम लोग और मैथिली का गांव मैथिली के नाम से जाना जा रहा है. इससे बड़ी ख़ुशी की बात कुछ नहीं हो सकता है. उन्होंने बात करते हुए कहा की मैथिली को संगीत से लगाव बच्चपन से ही है. जब वह छोटी थी तो उस समय मैथिली के दादा जी घर पर सुबह शाम रियाज किया करते थे. उसी दौरान मैथिली जो की छोटी सी ‘तन्नू’ थी वह अपने दादा जी के पास आकर बैठ जाती थी. यही से संगीत के प्रति मैथिली की बढ़ती रूचि ने उसे दिल्ली ले जाने पर मजबूर कर दिया.

गांव में संसाधन के अभाव में पिता रमेश ठाकुर मैथिली को लेकर दिल्ली चले गए जहाँ उन्होंने मैथिली को संगीत की शिक्षा दी. साथ ही मैथिली के पिता रमेश ठाकुर ने बताया कि वह दिल्ली में संगीत प्रशिक्षण केंद्र भी चलाते है. गांव से शुरू हुआ मैथिली का सफर ने आज अपना मुकाम हासिल कर लिया है.

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