बेशक नाम बूढ़ा-बूढ़ी बांध है, लेकिन अब यह अपनी रवानगी पर है। इसकी बदौलत आसपास की बंजर भूमि लहलहाने लगी है और सूखे हलक तर हो रहे। यह नक्सल प्रभावित बिहार के औरंगाबाद के देव प्रखंड के लोगों की मेहनत का नतीजा है, जिसकी तारीफ कौन बनेगा करोड़पति (KBC) शो में अमिताभ बच्चन भी कर चुके हैं। जब सरकार वे प्रशासन ने ग्रामीणों की इस बांध के निर्माण के आग्रह को दरकिनार कर दिया तो उन्‍होंने खुद ही इसके निर्माण का बीड़ा उठा लिया। परिणाम सामने है।

40 गांवों के बाशिंदों ने तकदीर बदलने की ठानी
कभी नक्सलियों के उपद्रव के कारण औरंगाबाद जिला के देव प्रखंड की ओर कोई रुख भी नहीं करता था। उसी कारण विकास कार्य भी ठप पड़े रहे। सिंचाई की समस्या के साथ पेयजल के लिए भी हाहाकार मचा रहता था। गर्मियों में पलायन की मजबूरी थी। ऐसे में 40 गांवों के बाशिंदों ने तकदीर बदलने की ठानी। गोकुल सामाजिक संस्था के कर्ता-धर्ता संजय सज्जन का साथ मिला और बांध ने अपना वजूद अख्तियार कर लिया।

पहाड़ के टपकते पानी से बनी बांध की परिकल्‍पना
बरवासोई पहाड़ी से बूंद-बूंद पानी नीचे टपकता था। बरसात के दिनों में वह पानी एकधार में तब्दील हो जाता था। यहीं से बांध की परिकल्पना बनी। पहाड़ के पानी के साथ बरसात के बर्बाद होने वाले पानी का संग्रह कर नहर निकालने का फैसला किया गया। सरकार का साथ नहीं मिला तो ग्रामीणों ने खुद ही कमर कस ली।

25 हजार लोगों के तीन साल के परिश्रम का प्रतिफल
40 से अधिक गांवों के 25 हजार हजार लोगों ने तकरीबन तीन साल तक पसीना बहाया। पहाड़ को काट कर बांध बनाया। बगलगीर गांव पर नाम दिया गया बूढ़ा-बूढ़ी बांध। उससे 22 फीट गहरी, 17 फीट चौड़ी व दो किलोमीटर लंबी नहर निकाली गई। उसे रामरेखा नहर कहते हैं। शुरुआती दौर में प्रतिदिन हजार से अधिक लोगों द्वारा 60 से अधिक दिनों तक सुबह से शाम तक श्रमदान किया गया। उसके बाद सौ लोग अगले दो साल तक दिन-रात खटते रहे।

जनसहयोग से इकट्ठा किया धन, एक करोड़ हुए खर्च
बांध के निर्माण में तकरीबन एक करोड़ रुपये खर्च हुए। बालूगंज के मोची शंभू राम की जीवन भर की कमाई लग गई। सेवानिवृत्त पुलिस इंस्पेक्टर चर्तुगुण पासवान का अनुभव भी खूब काम आया। प्रति बीघा तीन सौ रुपये के हिसाब से ग्रामीणों ने 12 लाख रुपये चंदा में मिले। शेष धन का बंदोबस्त गोकुल सामाजिक संस्था ने किया।

70 गांवों को मिल रहा पीने का पानी, 40 में सिंचाई
आज करीब 70 गांवों को इस बांध से पेयजल सुलभ है। उन गांवों में पहले अप्रैल-मई आते-आते चापाकल सूख जाते थे। आज महज 30 से 40 फीट पर शुद्ध पेयजल मिल रहा। बांध के मार्फत भूजल का स्तर इस कदर बढ़ा है। बांध के निकट बसे दर्जन भर से अधिक गांव के लोग पीने के लिए सीधे पानी लेते हैं। बरबासोई, बूढ़ा-बूढ़ी, बंधनडीह, बरंडा, रामपुर, बलयर, लिलजी, बरनी और बारा समेत 40 गांवों के किसान सिंचाई कर रहे हैं। तकरीबन सात हजार एकड़ भूमि की सिंचाई हो रही है। उन खेतों में फसलें लहलहा रही हैं। पानी का इंतजाम हुआ तो किसान पशुधन को भी सहेजने लगे।

अब जल-जीवन-हरियाली अभियान से जुड़ेगा बांध
कभी बांध के निर्माण में सहयोग नहीं करने वाले सरकार व प्रशासन के लोग भी अब इसकी सराहना कर रहे हैं। औरंगाबाद के जिलाधिकारी राहुल रंजन महिवाल इस बांध को बनाने वाले ग्रामीणों को सलाम करते हैं। कहते हैं कि इसे जल-जीवन-हरियाली अभियान के तहत और विकसित किया जाएगा। इसके लिए योजना बनाई गई है। इंजीनियरों की टीम निरीक्षण भी कर चुकी है। अभी राज्य सरकार द्वारा पईन का निर्माण कराया जा रहा है। निकट भविष्य में इस बांध के जरिए पूरे इलाके में हरियाली की योजना है।

Source – Jagran

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