कोविड-19 के बारे में वैज्ञानिक रोज नई जानकारियां जुटा रहे हैं. शुरुआत में माना गया कि ये इंसानों से इंसानों में नहीं फैलता. खुद World Health Organisation (WHO) का भी यही मानना था. बाद में खुलासा हुआ कि ये काफी संक्रामक है. कोविड-19 पॉजिटिव के खांसने-छींकने पर हवा में फैले वायरस आंख, नाक, मुंह के जरिए स्वस्थ व्यक्ति में पहुंच जाते हैं. यहां तक कि संक्रमित से सीधा संपर्क न होना भी वायरस को फैला सकता है. इस बीच ये बात भी उठी है कि क्या स्वस्थ लोग अगर बीमार व्यक्ति का टॉयलेट इस्तेमाल कर लें तो भी ये वायरस फैल सकता है! वैज्ञानिकों की इसपर अलग-अलग राय है.

कोरोना पर अब तक हुई रिसर्च में इसका इशारा मिलता है कि वायरस बीमार व्यक्ति के मल में भी होते हैं लेकिन भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि मल के जरिए वायरस फैलने का डर बहुत कम है. वायरस के फैलने का प्राथमिक स्त्रोत हवा ही है. इसके बाद बारी आती है हाथों के जरिए वायरस फैलने की. कोरोना पॉजिटिव से हाथ मिलाने या उसके छूने के बाद संक्रमित चीज को छूने पर भी वायरस फैलता है.

इसके बाद हम बात करें संक्रमित के मल की तो US Centers for Disease Control and Prevention (CDC) ने पाया कि कुछ कोरोना के मरीजों के मल में वायरस था. लेकिन ये पता नहीं लग सका कि स्टूल में वायरस क्या इतनी मात्रा में होता है कि किसी को संक्रमित कर सके या फिर क्या इससे संक्रमण का डर होता भी है. इस बारे में वे मानते हैं कि सार्स और मर्स की मदद से देखें तो लगता है कि ये वायरस भी मल के जरिए नहीं फैलता है.

ये हो सकता है कि टॉयलेट हो फ्लश करने पर वायरस बह जाते हों लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है. इसके अनुसार फ्लश करने पर वायरस या बैक्टीरिया बहते नहीं, बल्कि पानी की तेज बौछार के कारण बूंदों के जरिए यहां-वहां फैल जाते हैं. वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को toilet plumes कहते हैं. स्टडी कहती है कि फ्लश करने से पहले कमोड की लिड या ढक्कन बंद कर देना चाहिए, उसके बाद ही फ्लश हो. ऐसा न करने पर पानी की छोटी बूंदों के जरिए पैथोजन हमारे शरीर और पूरे बाथरूम में फैल जाते हैं. इससे बीमार होने का डर बढ़ जाता है, खासकर अगर घर में कोई संक्रमित व्यक्ति भी हो और एक ही टॉयलेट उपयोग में आता हो. वैसे toilet plumes पर अभी भी रिसर्च चल रही है. साल 2013 में American Journal of Infection Control ने इस पर एक स्टडी भी की, जिसके मुताबिक बिना लिड बंद किए फ्लश करना बहुतों को संक्रमित कर सकता है.

हालांकि कोरोना वायरस के मामले में भी माना जा रहा है कि चूंकि ये कई संक्रमितों के मल में भी दिखा, लिहाजा ठीक यही है कि संक्रमित के इस्तेमाल के बाद कमोड की लिड बंद करके फ्लश किया जाए. या हो सके तो संक्रमित का टॉयलेट कोई उपयोग न करे.

वैसे Chinese Center for Disease Control and Prevention (China CDC) ने भी इसपर रिसर्च की. इसके तहत कोरोना से संक्रमित मरीज का स्टूल लेकर उसे इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की मदद से देखा गया. इसमें कोरोना वायरस काफी संख्या में नजर आए. इसपर शोध में शामिल वैज्ञानिकों ने माना कि मल के जरिए भी ये संक्रमित से दूसरों तक पहुंच सकता है, अगर फ्लश ठीक से न हो या फिर हैंड हाइजीन का ध्यान न रखा जाए.

वैज्ञानिकों के अनुसार कोरोना वायरस की संक्रामकता का कारण यही है कि ये कई स्त्रोतों से फैल सकता है. एक और स्टडी भी इसी ओर इशारा करती है कि कोरोना वायरस मल से फैल सकता है. Emerging Microbes and Infections में आई इस स्टडी के अनुसार बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमितों के मल और यहां तक कि खून में भी कोरोना वायरस दिखा.

A woman cleans a bathroom toilet with a scrub brush.

कोरोना का फिलहाल कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है. लगभग सभी वैज्ञानिकों का मानना है कि टीका आने में सालभर लगेगा. इस बीच सोशल डिस्टेंसिंग के अलावा जिस एक बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है, वो है लगातार हाथ धोना. हालांकि भारत में हैंड हाइजीन को लेकर सबसे ज्यादा डर पानी की कमी है. WHO के मुताबिक 20 सेंकड तक कई स्टेप्स में हाथ धोना चाहिए. इस प्रक्रिया में लगभग 2 लीटर पानी लगता है. अगर 4 लोगों के परिवार की बात करें जहां रोज हर सदस्य लगभग 10 बार हाथ धोए तो सिर्फ 80 लीटर से ज्यादा पानी हाथ धोने पर ही खर्च करना होगा. भारत में कई राज्य पूरे साल सूखे से जूझते हैं, ऐसे में हैंड हाइजीन के जरिए कोरोना से बचाव कितना मुश्किल है, इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है. खुद NITI (नीति) आयोग के आंकड़े कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में लगभग 82% घरों में नलों (piped running water) की व्यवस्था नहीं. यहां तक कि शहरी इलाकों में भी 60 घरों के यही हाल हैं.

Source – News18

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