ककोलत जलप्रपात पर लगता है सत्तुआनी मेला

कही-सुनी

वर्ल्ड ऑफ बिहार फेयर


बिहार का कश्मीर माना जाने वाला ककोलत में सतुआनी मेले की शुरुआत हो गई है . पूर्व के वर्षो की भांति इस वर्ष भी 14 अप्रैल को सत्तुआनी मेला का आयोजन हुआ . तीन दिनों तक चलने वाले मेले को लेकर सभी तैयारियां पहले ही पूरी कर ली गई थी . मेले को लेकर पहले ही ककोलत की वादियां पूरी तरह रंगीन हो गई है . दुकाने सजने लगी है . मेले में मनोरंजन के साधनो का आना शुरू हो गया है . लोगो की भीड़ बढ़ने लगी है . तीन दिवसीय मेले में बिहार के हर हिस्से के लोग शामिल होते हैं . इसके साथ ही देश-विदेश के सैलानी भी इस मेले का आनंद उठाते हैं . इस दौरान वादियां पूरी तरह से बदल जाती है . मेला में आने वालों के स्वागत के लिए ककोलत विकास परिषद के कार्यकर्ता पूरी तैयार हैं . ककोलत जलप्रपात पर काफी समय से ही विशुआ के अवसर पर तीन दिनों का मेला लगता आ रहा है . स्थानीय लोग इसे सतुआनी मेला कहते हैं . मान्यता है कि इस दिनों ककोलत में स्नान करने से सर्प व गिरगिट योगी में जन्म लेने से मुक्ति मिलती है .
ककोलत महोत्सव की मांग


यहाँ के स्थानीय लोगो को ककोलत महोत्सव का इंतजार है . स्थानीय लोगो ने कहा कि महोत्सव होने से ककोलत की रौनक और बढ़ जायेगी . इससे इस क्षेत्र का विकास भी होगा . लम्बे समय के बाद सड़को की स्थिति अच्छी रहने के कारण पर्यटकों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है . प्रतिदिन सैकड़ों गाड़ियों से सैलानी यहाँ पहुंच रहे हैं . स्थानीय लोगो ने कहा कि ककोलत महोत्सव की घोषणा बहुत पहले हो चुकी है , लेकिन इस वर्ष महोत्सव होने की उम्मीद बढ़ी थी .
स्नान कर सत्तू करते हैं ग्रहण .गर्मी मौसम आने के साथ ही यहाँ पर्यटकों का आना-जाना शुरू हो जाता है . सत्तुआनी पर्व के मौके पर ककोलत जल प्रपात के पास जाना और पर्वत के ऊपर से ही गिरते जल में स्नान करना एक सुखद अनुभूति होती है . जिले के गोविंदपुर प्रखंड में 150 फ़ीट ऊंचे पर्वत से गिरते जल में तपिश मिटाने की शक्ति है . इस जल प्रपात में स्नान करने का धार्मिक महत्तव भी है .
कहते है कि राजा नृग गिरगिट योगी प्राप्त कर इसी जल प्रपात के पास निवास कर रहे थे . महाभारत में वर्णित काम्यक वन जो वर्तमान में ककोलत वन के नाम से प्रसिद्ध है , यहाँ अघ्यातवास के समय पांडवो से मिलने भगवन श्री कृष्ण यहां पधारे थे . भगवान के चरण स्पर्श से राजा नृग को गिरगिट योगी से मुक्ति मिली तथा उसी समय से गिरगिट व सर्प योगी से मुक्ति के लिये आसपास के ग्रामीण सतुआनी के मौके पर ककोलत में स्नान करते आ रहे हैं . इसके बाद स्थानीय नागरिक जल में स्नान कर सत्तुआ का भोजन करते हैं .

ककोलत जल प्रपात का प्रथम दर्शन 1811-12 में फ्रांसेस बुकानन ने किया था . तब ककोलत के आस-पास घना जंगल होने के साथ आम्रवन था . यहाँ दिन में भी पहुंचना मुश्किल था . तालाव काफी गहरा था . बिहारशरीफ अनुमंडल के एक अंग्रेज अधिकारी ने अपने भ्रमण के क्रम में यहाँ स्नान करने वालों के लिये गहरे तालाव में एक पत्थर डालना अनिवार्य बनाया तथा इसका कठोरता से पालन कराया . जल प्रपात के जल में भोजन पचाने की अदभुद शक्ति है . जल प्रपात का शीतल जल किसी अघ्यात जल भंडार से सदियों से गिरता आ रहा है .
यहाँ 108 कुंड तक लोग पहुंच सके हैं लेकिन सबसे अधिक दूरी का 150 फीट ऊंचाई से गिरते जल में लोग स्नान करते हैं . क्योकि इससे ऊपर के कुंडों तक पहुंचना मुश्किल होता है .

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