Tuesday, May 26, 2020
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एक गांव के गार्ड को मिलेगा साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार, हम सभी के लिए है गर्व की बात

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पेशे से चौकीदार, मगर गजब के साहित्यकार। साहित्य साधना ऐसी कि बड़े-बड़े साहित्यकार इनके मुरीद। सामान्य शिक्षा-दीक्षा के बाद पुलिस थाने में बतौर चौकीदार पद पर पहुंचे 33 साल के उमेश पासवान को मैथिली काव्य संग्रह ‘वर्णित रस’ के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार मिलने जा रहा है। अकादमी ने घोषणा कर दी है। यह सम्मान नवंबर में मिलेगा। उमेश खुश हैं। कहते हैं, पुरस्कार के रूप में मिलने वाले 50 हजार शहीद सैनिकों के बच्चों की शिक्षा के लिए दान देंगे।

दिल को छू लेने वाली कविताएं
उमेश की रचना में बाढ़ की विभीषिका पर दिल को छू लेने वाली कविताएं हैं। मधुबनी, बिहार के खुटौना प्रखंड अंतर्गत रामपुर बटेरमारी गांव के अत्यंत निर्धन व दलित परिवार में जन्मे उमेश पासवान का पालन-पोषण ननिहाल लौकही प्रखंड के औरहा गांव में हुआ और ये यहीं के होकर रह गए। अपने समाज की अशिक्षा, उसका शोषण, पिछड़ेपन का दर्द उमेश को बचपन से सालता था। समाज के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना जोर मारती थी। इसी क्रम में मन की कल्पनाओं ने रंग भरने शुरू किए और युवा मन काव्यात्मक होता चला गया।

2001 में मैटिक के बाद इंटरमीडिएट में विज्ञान और स्नातक बॉयोलॉजी ऑनर्स से किया। लेकिन, साहित्य प्रेम बरकरार रहा। 2003 से मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, पटना व नेपाल की कवि गोष्ठियों में शिरकत करने लगे। आकाशवाणी से प्रसारण की निरंतरता भी रही। अबतक दो मैथिली कविता संग्रह वर्णित रस और उपराग और हिंदी कविता संग्रह चन्द्रमणि की रचना कर चुके हैं। मैथिली में एक कथा संग्रह मनक बात को अंतिम रूप देने में ये जुटे हैं।

अनुकंपा के आधार पर मिली नौकरी 
2008 में पिता के निधन के उपरांत वे अनुकंपा के आधार पर 2010 में लौकही थाने के चौकीदार बने। उनका कोमल कवि मन पुलिस के कठोर कार्यशैली को स्वीकार नहीं करता। इसके बावजूद अपने कर्तव्य के प्रति पूरी निष्ठा रखते हैं। इनकी कर्तव्यपरायणता पर इन्हें पुलिस अधीक्षक द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है। लौकही थानाध्यक्ष रामाशीष कामति उनके हुनर के कायल हैं। कहते हैं कि उमेश पुलिसिया कर्तव्य के प्रति हमेशा सजग रहते हैं। पुलिस अधीक्षक, दीपक बरनवाल भी साहित्य के प्रति उमेश के अनुराग की सराहना करते हैं। साहित्य अकादमी के प्रतिनिधि डॉ. प्रेम मोहन मिश्र का कहना है कि उमेश पासवान की कविताओं में मिथिला की माटी की सोंधी खुशबू रचती-बसती है। सुदूर अंचल में बसे लोगों की ठेठ भाषा को ये अपनी कविताओं में पिरोते हैं। जनसमस्याओं, लोकभावनाओं को अपनी कविताओं में बड़े ही प्रभावी ढंग से उठाते हैं।

उमेश ने बताया कि साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कार के लिए चुनी गई इनकी कृति ‘वर्णित रस’ में कुल 65 कविताएं संग्रहित हैं। इनमें से कई कविताओं में क्षेत्र में तकरीबन हर वर्ष आने वाली बाढ़ विभीषिका को बेहतरीन शब्द संयोजन के जरिए पाठकों के समक्ष परोसा गया है। ‘वर्णित रस’ के अलावा उमेश की कृतियों में मैथिली काव्य संग्रह ‘उपराग’, हिन्दी कविता संग्रह ‘चंद्रमणि’ शामिल हैं। उमेश फिलहाल मैथिली कथा संग्रह ‘मनक बात’ को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उमेश को वर्ष 2013 में चेतनपा समिति , पटना द्वारा ‘महेश ग्रंथ पुरस्कार’ भी दिया जा चुका है। इसेक साथ ही उसी वर्ष मधुबनी के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक द्वारा उत्कृष्ट कार्य के लिए भी पुरस्कृत किया गया था। यहां बता दें कि उमेश साहित्याकि गतिविधियेां में अपनी सक्रियता के साथ ही औरही गांव में ही बच्चों के बीच ‘आस्था निश्शुल्क शिक्षण संस्थान ‘ का संचालन भी करते हैं।

पुरस्‍कार को माता-पिता का आशीर्वाद मानते हैं उमेश
साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा होने पर प्रफुल्लित उमेश ने इसका श्रेय अपने स्वर्गीय पिता खखन पासवान, माता अमेरिका देवी व मामा रामचंद्र पासवान के आशीर्वाद को दिया है। बचपन में परिवार की आर्थिक विपन्नता की स्थिति में ये अपने ननिहाल औरहा में आकर रहने लगे आसैर यहीं के होकर रह गए। यहां यह भी गौरतलब है कि ‘दैनिक जागरण’ ने बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा दान के इनेक अवदान पर आधारित विशेष रपट ‘वेतन की आधी राशि खर्च कर बच्चों को दे रहे निशुल्क शिक्षा’ अपने 20 मार्च 2018 के अंक में प्रकाशित की थी।

उधर, सीतामढ़ी जिला के रुदौली गांव के मूल निवासी सेंट्रल स्कूल के अवकाश प्राप्त शिक्षक बैद्यनाथ झा के मैथिली बाल कथा संग्रह ‘खिस्सा सुनू बाउ’ को इस वर्ष के साहित्य अकादमी बाल पुरस्कार देने की घोषणा का भी यहां के साहित्य प्रेमियेां ने स्वागत किया है। मैलोरंग प्रकाशन द्वाराप्रकाशित इस कथा संग्रह में श्री झा की 23 रचनाएं सन्निहित हैं। पूर्व में हिन्दी में इनका एक कथा संग्रह ‘छतरी में छेद’ प्रकाशित हो चुका है। श्री झा ने बताया कि इनकी पुरस्कृत कृति ‘खिस्सा सुनू बाउ’ में वैज्ञानिकता की परिकल्पना पर आधारित कहानियां हैं। इनका मारनना है कि आजकल के बच्चों को राजा-रानी ओश्र नैतिक शिक्षा वाली कहानियों की अपेक्षा यर्थाथ की धरातल वाली ऐसी ही कहानयों से रिझाया जा सकता है। श्री झा ने जागरण से कहा कि साहित्य अकादमी के पुरस्कार की घोषणा ने उनमें मैथिली में और अधिक जिम्मेदारी और समर्पण भाव से साहित्य साधना की ऊर्जा भरी है।

 

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